December 10, 2010

मादाम

आप बेवजह परेशान सी क्यों हैं मादाम
लोग
कहते हैं तो फिर ठीक ही कहते होंगे
मेरे
अहबाब ने तहजीब ना सीखी होगी
मेरे
माहौल में इंसान ना रहते होंगे

मादाम - madam
अहबाब - friends, society

नूर-ए-सरमाया से है रू-ए-तम्द्दुन की ज़िला
हम जहां हैं वहां तहजीब नहीं पल सकती
मुफलिसी हिस॒से-लताफात को मिटा देती है
भूक आदाब के सांचे में नहीं ढल सकती

नूर-ए-सरमाया - light of wealth
रू-ए-तमद्दुन - the face of civilization
ज़िला - Brilliance
हिस॒से-लताफात - soft emotions
आदाब - manners

लोग कहते हैं तो लोगों पे ताज़ुब कैसा
सच तो कहते हैं कि नादारों की इज्ज़त
कैसी
लोग कहते हैं - मगर आप अभी तक चुप हैं
आप भी कहिये ग़रीबों में शराफत कैसी

नादारों - Poors

नेक मादाम! बहुत जल्द वो दौर आयेगा
जब
हमें जीस्त के अदवार परखने होंगे
अपनी जिल्लत कि कसम, आपकी अज़्मत कि क़सम
हमको ताज़ीम के म़यार परखने होंगे

जीस्त - Life
अदवार - Values
ज़िल्लत- Insult
अज़्मत - Greatness
ताज़ीम - Respect
मयार - Levels


हमने हर दौर में तजलील सही है लेकिन
हमने हर दौर के चेहरे को ज़िया बख्शी है
हमने हर दौर में मेहनत की सितम झेलें हैं
हमने हर दौर के हाथों को हिना बख्शी है

ज़िया - Brilliance


लेकिन इन तल्ख़ मुबाहिस से भला क्या हासिल
लोग कहते हैं तो फिर ठीक ही कहते होंगे
मेरे अहबाब ने तहजीब ना सीखी होगी
मैं जहां रहता हूँ इंसान ना रहते होंगे

तल्ख़ - Bitter
मुबाहिस - Debates



साहिर लुध्यानवी

1 comment:

जितेन्द्र ‘जौहर’ Jitendra Jauhar said...

यदि आपने साहिर लुधियानवी जी की ‘मादाम’ शीर्षक इस रचना के संदर्भ/प्रसंग का भी उल्लेख कर दिया होता, तो पाठकगण इसको बेहतर ढंग से समझ पाते।

संदर्भ/प्रसंग के अभाव में यह उत्कृष्ठ रचना उतना आनन्द नहीं दे पायी...जितनी कि दे सकती थी।
कृपया पोस्ट को एडिट करके उसमें कम-से-कम यह जोड़ दें कि इस रचना में किस मैडम को संबोधित किया था-साहिर लुधियानवी जी ने!

मैं इंतज़ार करूँगा...भाई!