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December 21, 2010

एक ख्वाब और

एक ख्वाब और

ख्वाब अब हुस्न - -तसव्वुर के उफक से हैं परे

दिल के एक जज्बा - -मासूम ने देखे थे जो खवाब
और ताबीरों के तपते हुए सहराओं में
तश्नगी आबला -पा , शोला -बकफ मौज - -सराब
ये तौ मुमकिन नहीं बचपन का कोई दिन मिल जाए
या पलट आये कोई आत - -नायाब - -शबाब
फूट निकले किसी अफ्सुर्दः तबस्सुम से किरण
या दमक उट्ठे किसी दस्त - -बुरीदः में गुलाब
आह ! पत्थर की लकीरें हैं के यादों के नुकूश
कौन लिख सकता है फिर उम्र - -गुज़िश्ता की किताब
बीते लम्हात के सोये हुए तूफानों में

तैरते फिरते हैं फूटी हुई आँखों के हबाब
ताबिश रंग - -शफक , आतिश रू - -खुर्शीद
मल के चेहरे पे सहर आयी है खून अहबाब
जाने किस मोड़ पे , किस राह में क्या बीती है
किस से मुमकिन है तमन्नाओं के ज़ख्मों का हिसाब
आस्तीनों को पुकारेंगे कहाँ तक आँसूं
अब तो दामन को पकड़ते हैं लहू के गर्दाब
देखती फिरती है एक एक का मुंह खामोशी
जाने क्या बात है शर्मिंदा है अंदाज़ - -खिताब
दर --दर ठोकरें खाते हुवे फिरते हैं सवाल
और मुजरिम की तरह उनसे गुरेज़ाँ हैं जवाब
सरकशी , फिर मैं तुझे आज सदा देता हूँ
मैं तेरा शायिर - -आवारा - -बे -बाक - -खराब
फ़ेंक फिर जज्बा - -बेताब की आलम पे कमंद
एक ख्वाब और आइ हिम्मत - -दुश्वार पसंद

अली सरदार जाफरी

December 20, 2010

माँ है रेशम के कारखाने में

मां है रेशम के कारखाने में 
बाप मसरूफ सूती मिल में है 
कोख से मां की जब से निकला है 
बच्चा खोली के काले दिल में है 
जब यहाँ से निकल के जाएगा 
कारखानों के काम आयेगा 
अपने मजबूर पेट की खातिर 
भूक सर्माये की बढ़ाएगा 
हाथ सोने के फूल उगलेंगे 
जिस्म चांदी का धन लुटाएगा 
खिड़कियाँ होंगी बैंक की रोशन 
खून इसका दिए जलायेगा 
यह जो नन्हा है भोला भाला है 
खूनीं सर्माये का निवाला है 
पूछती है यह इसकी खामोशी 
कोई मुझको बचाने वाला है!

[सरमायेदार =capitalists] 

 अली सरदार जाफरी