मैं इस उम्मीद पे डूबा कि तू बचा लेगा
अब इसके बाद मेरा इम्तेहान क्या लेगा
यह एक मेला है वादा किसी से क्या लेगा
ढलेगा दिन तो हर एक अपना रास्ता लेगा
मैं बुझ गया तो हमेशा को बुझ ही जाऊँगा
कोई चिराग नहीं हूँ जो फिर जला लेगा
मैं उसका हो नहीं सकता बता न देना उसे
सुनेगा तो लकीरें हाथ की अपनी वो सब जला लेगा
हज़ार तोड़ के आ जाऊं उस से रिश्ता वसीम
मैं जानता हूँ वो जब चाहेगा बुला लेगा
वसीम बरेलवी
Showing posts with label वसीम बरेलवी. Show all posts
Showing posts with label वसीम बरेलवी. Show all posts
December 20, 2010
एतबार
कही सुनी पे बोहत एतबार करने लगे
मेरे ही लोग मुझे संगसार* करने लगे
[*संगसार=पत्थर मारना, getting brickbats]
पुराने लोगों के दिल भी हैं खुशबुओं की तरह
ज़रा किसी से मिले, एतबार करने लगे
नए ज़माने से आँखें नहीं मिला पाये
तो लोग गुज़रे ज़माने से प्यार करने लगे
कोई इशारा, दिलासा न कोई वादा मगर
जब आई शाम तेरा इंतज़ार करने लगे
हमारी सादामिजाजी कि दाद दे कि तुझे
बगैर परखे तेरा एतबार करने लगे
वसीम बरेलवी
मेरे ही लोग मुझे संगसार* करने लगे
[*संगसार=पत्थर मारना, getting brickbats]
पुराने लोगों के दिल भी हैं खुशबुओं की तरह
ज़रा किसी से मिले, एतबार करने लगे
नए ज़माने से आँखें नहीं मिला पाये
तो लोग गुज़रे ज़माने से प्यार करने लगे
कोई इशारा, दिलासा न कोई वादा मगर
जब आई शाम तेरा इंतज़ार करने लगे
हमारी सादामिजाजी कि दाद दे कि तुझे
बगैर परखे तेरा एतबार करने लगे
वसीम बरेलवी
Labels:
उर्दू ग़ज़ल,
ग़ज़ल,
वसीम बरेलवी,
शायरी
November 15, 2010
अपने हर हर लफ्ज़ का खुद आईना हो जाऊंगा
अपने हर हर लफ्ज़ का खुद आईना हो जाऊँगा ,
उस को छोटा कह के मैं कैसे बड़ा हो जाऊँगा
तुम गिराने में लगे थे तुम ने सोचा ही नहीं,
मैं गिरा तो मसला बन कर खड़ा हो जाऊँगा
मुझ को चलने दो अकेले है अभी मेरा सफ़र,
रास्ता रोका गया तो काफिला हो जाऊंगा
सारी दुनिया की नज़र में है मेरा अहद-ए-वफ़ा,
एक तेरे कहने से क्या मैं बेवफा हो जाऊंगा
वसीम बरेलवी
Labels:
उर्दू ग़ज़ल,
ग़ज़ल,
वसीम बरेलवी,
शायरी
मैं चाहता भी यही था वो बेवफा निकले
मैं चाहता भी यही था वो बेवफा निकले,
उसे समझने का कोई तो सिलसिला निकले
किताब ए माजी के औराक़ उलट के देख ज़रा,
ना जाने कोनसा सफा मुङा हुआ निकले
जो दिखने में बहुत ही करीब लगता है,
उसी के बारे में सोचो तो फासला निकले
वसीम बरेलवी
Labels:
उर्दू ग़ज़ल,
ग़ज़ल,
वसीम बरेलवी,
शायरी
Subscribe to:
Posts (Atom)