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November 15, 2010

हमारे दरम्यां ऐसा कोई रिश्ता नहीं था - परवीन शाकिर

हमारे दरम्यां ऐसा कोई रिश्ता नहीं था
तेरे शानों पे कोई छत नहीं थी
मेरे जिम्मे कोई आँगन नहीं था
कोई वादा तेरी ज़ंजीर-ए-पा बनने नहीं पाया
किसी इकरार ने मेरी कलाई को नहीं थामा
हवा-ए-दश्त की मानिंद
तू आज़ाद था
रास्ते तेरी मर्ज़ी के ताबे थे
मुझे भी अपनी तन्हाई पे
देखा जाए तो
पूरा तस्सरूफ़ था
मगर जब आज तू ने
रास्ता बदला
तो कुछ ऐसा लगा मुझ को
के जैसे तू ने मुझ से बेवफाई की



परवीन शाकिर

चेहरा मेरा था निगाहें उसकी


चेहरा मेरा था निगाहें उसकी ,
खामुशी में भी वो बातें उसकी।

मेरे चेहरे पे ग़ज़ल लिखती गयीं ,
शेर कहती हुई आँखे उसकी।

शोख लम्हों का पता देने लगीं ,
तेज़ होती हुई सांसें उसकी।

ऐसे मौसम भी गुज़ारे हमने,
सुबहें जब अपनी थीं शामें उसकी।

ध्यान में उसके ये आलम था कभी,
आँख महताब की यादें उसकी।

फैसला मौज-ए-हवा ने लिखा,
आंधियां मेरी बहारें उसकी।

नींद इस सोच से टूटती अक्सर,
किस तरह कटती हैं रातें उसकी।

दूर रह कर भी सदा रहती हैं,
मुझको थामे हुए बाहें उसकी।



परवीन शा़किर