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August 26, 2008

तू मुझे इतने प्यार से मत देख

तू मुझे इतने प्यार से मत देख
तेरी पलको के नर्म साए में
धूप भी चान्दनी सी लगती है
और मुझे कितनी दूर जाना है
रेत है गर्म, पांव के छाले
यू दमकते हैं जैसे अंगारे
प्यार कि ये नज़र रहे, न रहे
कौन दश्त-ऐ-वफ़ा में जाता है
तेरे दिल को ख़बर रहे न रहे
तू मुझे इतने प्यार से मत देख

अली सरदार जाफरी

May 25, 2008

दिल से जिगर तक

एक जू-ए-दर्द दिल से जिगर तक रवां है आज
पिघला हुआ रगों में इक आतिश-फिशां है आज

जू-ए-दर्द = दर्द की नदी
आतिश-फिशां = ज्वालामुखी

लब सी दिए हैं ता न शिकायत करे कोई
लेकिन हर एक ज़ख्म के मुँह में जबां है आज

तारीकियों ने घेर लिया है हयात को
लेकिन किसी का रू-ए-हसीं दरमि्याँ है आज

तारीकियों = अंधेरों
रू-ए-हसीं = सुंदर चेहरा

जीने का वक्त है यही मरने का वक्त है
दिल अपनी जिंदगी से बहुत शादमां है आज

शादमां= खुश

हो जाता हूँ शहीद हर अहल-ए-वफ़ा के साथ
हर दास्तान-ए-शौक़ मेरी दास्ताँ है आज

अहल-ए-वफ़ा = वफ़ा करने वाला
दास्तान-ए-शौक़ = प्रेम कि कहानी

आए हैं किस निशा़त से हम क़त्लगाह में
ज़ख्मों से दिल है चूर, नज़र गुल-फिशां है आज

निशा़त= खुशी
क़त्लगाह= वध स्थल
गुल-फिशां = फूल फैलाने वाली

जिन्दानियों ने तोड़ दिया ज़ुल्म का गुरूर
वो दबदबा, वो रौब-ए-हुकूमत कहाँ है आज


जिन्दानियों= कैदीयों


अली सरदार जाफरी








May 22, 2008

काम ना आएगा कोई दिल के सिवा

काम अब कोई ना आएगा बस इक दिल के सिवा
रास्ते बंद हैं सब कूचा-ए-कातिल के सिवा

बाईस-ए-रश्क है तन्हारवी-ए-रहरौ-ए-शौक़
हमसफ़र कोई नहीं दूरी-ए-मंजिल के सिवा

हम ने दुनिया कि हर इक शै से उठाया दिल को
लेकिन इक शोख के हंगामा-ए-महफ़िल के सिवा

तेग मुंसिफ हो जहाँ, दार-ओ-रसन हों शाहिद
बेगुनाह कौन है उस शहर में कातिल के सिवा

जाने किस रंग से आई है गुलशन में बहार
कोई नगमा ही नहीं शोर -ए-सिलासिल के सिवा

अली सरदार जाफरी