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December 6, 2010
ज़िन्दगी ये तो नहीं तुझको संवारा ही ना हो
ज़िन्दगी ये तो नहीं तुझको संवारा ही न हो
कुछ ना कुछ तेरा एहसान उतारा ही न हो
कू-ए-कातिल की बड़ी धूम है, चल कर देख्नें
क्या खबर, कूचा-ए-दिलदार से प्यारा ही न हो
दिल को छू जाती है रात की आवाज कभी
चौंक उठता हूँ कहीं तूने पुकारा ही न हो
कभी पलकों पे चमकती है जो अश्कों की लकीर
सोचता हूँ तेरे आँचल का किनारा ही न हो
ज़िंदगी एक खलिश दे के न रह जा मुझको
दर्द वो दे जो किसी सूरत गवारा ही न हो
शर्म आती है के उस शहर में हम हैं के जहां
न मिले भीक तो लाखों का गुज़ारा ही न हो
जां निसार अख्तर
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December 5, 2010
अशआर मेरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं
अशआर मेरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं
कुछ शे़र फ़क़त उनको सुनाने के लिए हैं।
अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें
कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं।
आँखों में जो भर लोगे तो कांटो से चुभेंगे
ये ख़ाब तो पलकों पे सजाने के लिए हैं।
देखूं तेरे हाथों को तो लगता है तेरे हाथ
मंदिर में फ़कत दीप जलाने के लिए हैं।
सोचो तो बड़ी चीज़ है तहजीब बदन की
वरना तो बदन आग बुझाने के लिए हैं।
ये इल्म का सौदा ये रिसाले ये किताबें
इक शख्स की यादों को भुलाने के लिए हैं।
जां निसार अख्तर
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