March 29, 2008

इस मौसम में

बस एक वक्त का खंजर मेरी तलाश में है,
जो रोज़ भेष बदल कर मेरी तलाश में है।

मैं एक कतरा हूं मेरा अलग वजूद तो है,
हुआ करे जो समंदर मेरी तलाश में है ।

मैं देवता की तरह कैद अपने मन्दिर में,
वो मेरे जिस्म के बाहर मेरी तलाश में है।

जिसके हाथ में एक फूल देके आया था,
उसी के हाथ का पत्थर मेरी तलाश में है।


कृष्ण बिहारी नूर





इक ग़ज़ल उस पे लिखूं दिल का तकाजा है बहुत,
इन दिनों ख़ुद से बिछड़ जाने का धड़का है बहुत ।

रात हो दिन हो गफलत हो की बेदारी हो,
उसको देखा तो नहीं है उसे सोचा है बहुत ।

तशनगी के भी मुकामात हैं क्या क्या यानी,
कभी दरिया नहीं काफी, कभी कतरा है बहुत ।

कोई आया है ज़रूर और यहाँ ठहरा भी है,
घर की दहलीज़ पा-ऐ-नूर उजाला है बहुत ।

कृष्ण बिहारी नूर


देखना है वो मुझ पर मेहरबान कितना है,
असलियत कहाँ तक है और गुमान कितना है।

क्या पनाह देती है और ये ज़मीन मुझ को,
और अभी मेरे सर पर आसमान कितना है ।

फिर उदास कर देगी सरसरी झलक उस की,
भूल कर ये दिल उस को शादमान कितना है।

कृष्ण बिहारी नूर

नज़र मिला न सके उस से उस निगाह के बाद,
वही है हाल हमारा जो हो गुनाह के बाद ।

मैं कैसे और किस सिम्त मोड़ता ख़ुद को ,
किसी की चाह न थी दिल में तेरी चाह के बाद ।

ज़मीर काँप तो जाता है आप कुछ भी कहें,
वो हो गुनाह से पहले के हो गुनाह के बाद ।

हवस ने तोड़ दी बरसों की साधना मेरी ,
गुनाह किया है ये जाना मगर गुनाह के बाद ।

गवाह चाह रहे थे वो बेगुनाही का
जुबां से कह न सका कुछ खुदा-गवाह के बाद ।

खतूत कर दिए वापिस मगर मेरी नींदें,
इन्हें भी छोड़ दो इक रहम की निगाह के बाद।

March 25, 2008

पहली सी मोहब्बत न मांग

मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब ना माँग

मैं ने समझा था कि तू है तो दरख्शां है हयात
तेरा गम हैं तो गम-ए-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम मे बहारों को सबात
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है

तू जो मिल जाये तो तकदीर निगूं हो जाये
यूँ ना था, मैं ने फकत चाहा था यूँ हो जाये
और भी दुःख हैं ज़माने मे मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब ना माँग

अनगिनत सदियों के तारीक़ बहीमाना तलिस्म
रेशम-ओ-अतलस-ओ-कम्ख्वाब में बुनवाये हुये
जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लिथड़े हुए, ख़ून में नहलाये हुए

जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से
पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मगर क्या कीजे

और भी दुःख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहते और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब ना माँग

'फैज़'

गालिब

दिल-ए-नादान तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द कि दवा क्या है।

हम हैं मुश्ताक और वो बेज़ार
या इलाही ये माजरा क्या है।

मैं भी मुँह मे ज़बान रखता हूँ
काश पूछो कि मुद्दा क्या है।

जब कि तुझ बिन नही कोई मौजूद
फिर ये हंगामा ए खुदा क्या है।

हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है।

जान तुम पर निसार करता हूँ
मैं नहीं जानता दुआ क्या है।

मैंने माना कि कुछ नहीं ग़ालिब
मुफ़्त हाथ आये तो बुरा क्या है ।

ग़ालिब

बहार आई

बहार आई तो जैसे एक बार
लौट आये हैं फिर अदम से
वो ख़्वाब सारे, शबाब सारे
जो तेरे होंटों पे मर मिटे थे
जो मिट के हर बार फिर जिए थे
निखर गएँ हैं गुलाब सारे
जो तेरी यादों से मुश्क्बू हैं
जो तेरे उश्शाक का लहू हैं
उबल पड़े हैं अज़ाब सारे
मलाल-ए-अहवाल-ए-दोस्तां भी
खुमार-ए-आगोश-ए-महवशां भी
गुबार-ए-खातिर के बाब सारे
तेरे हमारे
सवाल सारे, जवाब सारे
बहार आई तो खुल गए हैं
नए सिरे से हिसाब सारे


'फैज़'

March 17, 2008

मोमिन

असर उसको ज़रा नहीं होता,
रंज राहत-फज़ा नहीं होता।

बे-वफ़ा कहने की शिकायत है,
तो भी वादा-वफ़ा नहीं होता।

जिक्र-ऐ-अगयार से हुआ मालूम,
हर्फ़-ऐ-नासेह बुरा नहीं होता।

तुम हमारे किसी तरह ना हुए,
वरना दुनिया में क्या नहीं होता।

उस ने क्या जाने क्या किया ले कर,
दिल किसी काम का नहीं होता।

इम्तिहान कीजिये मेरा जब तक,
शौक़ ज़ोर-आज़मा नहीं होता।

एक दुश्मन की चर्ख है, ना रहे,
तुझ से ये ऐ दुआ नहीं होता।

नारसाई से दम रुके तो रुके,
मैं किसी से ख़फा नहीं होता।

तुम मेरे पास होते हो गोया,
जब कोई दूसरा नहीं होता।

हाल-ए-दिल यार को लिखूं क्यूँ-कर,
हाथ दिल से जुदा नहीं होता।

रहम कर, खस्म-ऐ-जान-ऐ-गैर ना हो,
सब का दिल एक सा नहीं होता।

दामन उसका जो है दराज़ तो हो,
दस्त-ए-आशिक रसा नहीं होता।

किसको है ज़ौक-ए-तल्ख़-कलामी लैक,
जंग बिन कुछ मज़ा नहीं होता।

चारा-ए-दिल सिवाय सब्र नहीं,
सो तुम्हारे सिवा नहीं होता।

क्यूँ सुने अर्ज़-ए-मुज़्तरिब ऐ मोमिन,
सनम आखिर खुदा नहीं होता।

फैज़ अहमद फैज़

सच है हम ही को आप के शिकवे बजा ना थे,
बेशक सितम जनाब के सब दोस्ताना थे।

हाँ जो जफ़ा भी आप ने की,कायदे से की,
हाँ हम ही काराबंद-ए-उसूल-ए-वफ़ा ना थे।

आये तो यूँ की जैसे हमेशा थे मेहरबान,
भूले तो यूँ की गोया कभी आशना ना थे।

फैज़

हम पर तुम्हारी चाह का इल्ज़ाम ही तो है,
दुशनाम तो नहीं है ये इकराम ही तो है।

दिल मुद्दई के हर्फ़-ए-मलामत से शाद है,
ए जान-ए-जां, ये हर्फ़ तेरा नाम ही तो है।

दिल ना-उम्मीद तो नहीं, नाकाम ही तो है,
लम्बी है गम की शाम, मगर शाम ही तो है।

फैज़


गुलों मे रंग भरे बाद-ए-नौबहार चले
चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले।

कफ़स उदास है यारो सबा से कुछ तो कहो
कहीं तो बहर-ए-खुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले।

कभी तो सुबह तेरे कुन्ज-ए-लब से हो आगाज़
कभी तो शब सर-ए-काकुल से मुश्कबार चले।

बड़ा है दर्द का रिश्ता, ये दिल गरीब सही
तुम्हारे नाम पे आएंगे गमगुसार चले।

जो हम पे गुजरी सो गुजरी मगर शब-ए-हिजरां
हमारे अश्क तेरी आकबत संवार चले।

हुज़ूर-ए-यार हुई दफ्तर-ए-जुनून की तलब
गिरह मे लेके गरेबां के तार-तार चले।

मकाम कोई फैज़ राह मे जचा ही नही
जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले।

फैज़


आये कुछ अब्र कुछ शराब आये
उसके बाद आये जो अज़ाब आये।


उम्र के हर वर्क पे दिल को नज़र
तेरी मेहर-ओ-वफ़ा के बाब आये।


कर रहा था गम-ए-जहाँ का हिसाब
आज तुम याद बेहिसाब आये।


इस तरह अपनी खामोशी गूंजी
गोया हर सिम्त से जवाब आये।


'फैज़'


तुम न आये थे तो हर चीज़ वही थी के जो है
आसमाँ हद-ए-नज़र, राह-गुज़र राह-गुज़र, शीशा-ए-मय शीशा-ए-मय
और अब शीशा-ए-मय, राह-गुज़र, रंग-ए-फ़लक
रंग है दिल का मेरे "खून-ए-जिगर होने तक"
चम्पई रंग कभी, राहत-ए-दीदार का रंग
सुरमई रंग के है सा'अत-ए-बेज़ार का रंग
ज़र्द पत्तों का, खस-ओ-ख़ार का रंग
सुर्ख फूलों का, दहकते हुए गुलज़ार का रंग
ज़हर का रंग, लहू-रंग, शब-ए-तार का रंग


आसमाँ, राह-गुज़र, शीशा-ए-मय
कोई भीगा हुआ दामन, कोई दुखती हुई रग
कोई हर लहज़ा बदलता हुआ आइना है
अब जो आये हो तो ठहरो के कोई रंग, कोई रुत, कोई शय
एक जगह पर ठहरे

फिर से एक बार हर एक चीज़ वही हो जो है
आसमाँ हद-ए-नज़र, राह-गुज़र राह-गुज़र, शीशा-ए-मय शीशा-ए-मय


'फैज़'


आ के वाबस्ता हैं उस हुस्न की यादें तुझ से
जिस ने दिल को परी-खाना बना रखा था.
जिसकी उल्फत में भुला रखी थी दुनिया हम ने
दहर को दहर का अफ़साना बना रखा था.


आशनां हैं तेरे क़दमों से वो राहें जिन पर
उसकी मदहोश जवानी ने इनायत की है।

कारवाँ गुज़रे हैं जिन से उसी रानाई के
जिस की इन आंखों ने बे-सूद इबादत की है।


तुझ से खेली हैं वो महबूब हवाएं जिन में
उसके मलबूस की अफ्सुर्दा महक बाकी है.
तुझ पे भी बरसा है उस बाम से महताब का नूर
जिस में बीती हुई रातों की कसक बाकी है.


तू ने देखी है वो पेशानी, वो रुखसार, वो होंट
ज़िंदगी जिनके तसव्वुर में लुटा दी हम ने.
तुझ पे उठी हैं वो खोई हुई साहिर आँखें
तुझ को मालूम है क्यों उम्र गंवा दी हम ने.


हम पे मुस्कराते हैं एहसान गम-ए-उल्फत के
इतने एहसान की गिनवाऊं तो गिनवा न सकूं.
हम ने इस इश्क में क्या खोया है, क्या सीखा है
जुज़ तेरे और को समझाऊँ तो समझा न सकूँ.


आजिज़ी सीखी, गरीबों की हिमायत सीखी
यास-ओ-हिर्मान के, दुख-दर्द के मानी सीखे
ज़ेर-दस्तों के मसाइब को समझना सीखा
सर्द आहों के, रुख-ए-ज़र्द के मानी सीखे


जब कहीं बैठ के रोते हैं वो बे-कस जिनके
अश्क आंखों में बिलखते हुए सो जाते हैं
न-तावानों के निवालों पे झपटते हैं उकाब
बाज़ू तोले हुए, मंडराते हुए आते हैं


जब कभी बिकता है बाज़ार में मजदूर का गोश्त
शाहराहों पे गरीबों का लहू बहता है
आग सी सीने में रह रह के उबलती है, ना पूछ!
अपने दिल पर मुझे काबू ही नहीं रहता है !!


'फैज़'


कभी कभी याद में उभरते हैं नक्श-ऐ-माज़ी मिटे मिटे से
वो आज़माइश दिल-ओ-नज़र की, वो कुर्बतें सी, वो फासले से।


कभी कभी आरज़ू के सेहरा में आ के रुकते हैं क़ाफिले से
वो सारी बातें लगाओ की सी, वो सारे उनवान विसाल के से।


निगाह-ओ-दिल को करार कैसा, निशात-ओ-ग़म में कमी कहाँ की?
वो जब मिले हैं तो उन से हर बार की है उल्फत नए सिरे से ।


तुम ही कहो रिंद-ओ-मुह्तसिब में है आज शब कौन फर्क ऐसा
ये आ के बैठे हैं मयकदे में, वो उठ के आए हैं मयकदे से ।


'फैज़'

ग़ालिब

आह को चाहिये एक उम्र असर होने तक,
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक।


आशिकी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब,
दिल का क्या रंग करूँ ख़ून-ए-जिगर होने तक।


हमने माना की तगाफुल ना करोगे लेकिन,
ख़ाक हो जायेंगे हम तुमको खबर होने तक।


गम-ए-हस्ती का असद किस से हो जुज़ मर्ग ईलाज,
शमा हर रंग में जलती है सहर होने तक।

गालिब

ये ना थी हमारी किस्मत के विसाल-ए-यार होता,
अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता।

तेरे वादे पे जिए हम तो ये जान झूठ जाना,
कि खुशी से मर ना जाते अगर ऐतबार होता।

कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीर-ए-नीमकश को,
यह खलिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता।

कहूं किस से मैं की क्या है, शब्-ए-गम बुरी बला है,
मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता।

हुए मर के हम जो रुसवा, हुए क्यों ना गर्क-ए-दरिया,
ना कभी जनाज़ा उठता, ना कहीं मज़ार होता ।


गालिब


हज़ारों ख्वाहिशें ऎसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।


मोहब्बत मे नहीं है फर्क जीने और मरने का,

उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पर दम निकले।



गालिब


दिल ही तो है ना संग-ए-खिश्त, दर्द से भर ना आये क्यों,
रोएंगे हम हज़ार बार, कोई हमें सताए क्यों।


दैर नहीं, हरम नहीं, दर नहीं, आस्तां नहीं,
बैठे हैं रहगुज़र पे हम, ग़ैर हमें उठाये क्यों।


क़ैद-ए-हयात-ओ-बंद-ए-गम असल मे दोनों एक हैं,
मौत से पहले आदमी गम से निजात पाए क्यों।


हाँ वो नहीं खुदापरस्त, जाओ वो बेवफा सही,
जिसको हो दीन-ओ-दिल अज़ीज़, उसकी गली मे जाये क्यों।


गालिब-ए-खस्ता के बग़ैर कौन से काम बंद हैं,
रोईये ज़ार-ज़ार क्या, कीजिए हाय-हाय क्यों।


गालिब

March 16, 2008

राजीव खन्ना

लोग लेते हैं लुत्फ़ मेरे तमाशा होने का,
देख तेरी मोहब्बत ने क्या इनाम दिए हैं मुझको

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वह आवाज देते हैं,बुलाते हैं अब हमें,
नादाँ हैं कोई समझाये की कब्र से जवाब कौन दे।

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उनकी आंखो से छलकती है मय की मस्ती,
लोग समझते हैं की हम मैखाने से आए हैं।

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ख़बर दे गए जमाने को शरमा के तुम,
लोग समझ गए की हमारा तुमसे कुछ रिश्ता है।

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सब पूछते हैं मुझ से इस दर्द का सबब,
तू बता किस अंदाज से तेरा नाम बयां करुं।

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सब समझते हैं के मैं इश्क का मारा हूँ
हाँ , अनजान हैं,
के उन्होंने अभी मेरा महबूब नही देखा ।

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ये किस्से हैं ना रांझे के, न फरहाद की बातें,
ये बातें हैं हमारी बातें - तुम्हारी बातें।

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यूँ ही कम है ज़िंदगी मोहब्बत के लिए ,
रूठ कर वक्त गवाने की ज़रुरत क्या है

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बिना शुरू किए उसने अंजाम लिख दिया
उसने किताब पे अपनी , मेरा नाम लिख दिया

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उठ के मत चले जाना
तुमसे रोशन कोना-कोना है,
ज़िंदगी और मौत का मतलब,
तुमको पाना और तुमको खोना है।



राजीव खन्ना





March 10, 2008

साहिर लुध्यानवी

तुमको ख़बर नहीं है मगर इक सादा लोह१ को,
बरबाद कर दिया तेरे दो दिन के प्यार ने।

१= सादा आदमी

***

लो आज हमने तोड़ दिया रिश्ता-ऐ-उम्मीद,
लो अब कभी गिला ना करेंगे किसी से हम।

***

किस दर्जा दिल-शिकन थे मोहब्बत के हादसे,
हम ज़िंदगी में फिर कोई अरमां ना कर सके।

***

सजा का हाल सुनाएं ज़जा1 की बात करें,
खुदा मिला हो जिन्हे वो खुदा की बात करें।

हर एक दौर का मजहब नया खुदा लाया,
करें तो हम भी मगर किस खुदा की बात करें।

वफ़ा-शियार2 कई हैं ,कोई हसीन भी तो हो,
चलो फिर आज उसी बेवफा की बात करें।

१= अच्छे कर्मों का फल
२=वफ़ा करने वाले

***

ये जमीन जिस कदर सजाई गयी,
जिन्दगी की तड़प बढाई गयी।

आईने से बिगड़ कर बैठ गए,
जिनकी सूरत जिन्हे दिखायी गई।

नस्ल दर नस्ल इंतजार रहा,
कसर1 टूटे ना बेनवाई२ गयी।

मौत पायी सलीब पर हमने ,
उमर बनबास में बितायी गई।

१= महल
२= गरीबी

***

लब१ पे पाबंदी तो है, अहसास पे पहरा तो है,
फिर भी अहल-ऐ-दिल2 को अहवाल-ऐ-बशर3 कहना तो है।

बुझ रहे हैं एक एक करके अकीदों4 के दीये,
इस अंधेरे का भी लेकिन सामना करना तो है।

१= बोलने
२= दिल वाले
३=आम आदमी का हाल
४=विश्वास

***

बहुत घुटन है,कोई सूरत-ऐ-बयां१ निकले,
अगर सदा२ ना उठे,कम से कम फुगां३ निकले।

फकीर-ऐ-शहर४ के तन पर लिबास बाकी है,
अमीर-ऐ-शहर५ के अरमां अभी कहाँ निकले।

हकीकतें हैं सलामत तो ख़ाब बहुतेरे,
उदास क्यों हो जो कुछ ख़ाब रायगां६ निकले।

उधर भी खाक उड़ी है ,उधर भी जख्म पड़े,
जिधर से होके बहारों के कारवां निकले।

सितम के दौर में हम अहल-ऐ-दिल७ ही काम आए,
जबाँ पे नाज था जिनको वो बेजबान निकले।

१= बताने का तरीका
२=बुलंद आवाज
३=दबी आवाज
४= ग़रीबों
५= अमीरों
६= बेकार
७= दिल वाले

***

मैं जिंदा हूँ ये मुश्तहर१ कीजिये,
मेरे कातिलों को ख़बर कीजिये।

जमीं सख्त है,आसमान दूर है,
बसर हो सके तो बसर कीजिये।

सितम के बहुत से हैं रद्द-ऐ-अमल२ ,
ज़रुरी नहीं चश्म-तर३ कीजिये।

१= बताना
२= प्रतिक्रिया
३= रोना

***

तुम ना जाने किस जहाँ में खो गए,
हम भरी दुनिया में तनहा हो गए।

***

अभी जिन्दां हूँ लेकिन सोचता रहता हूँ खिल्वत१ में,
की अब तक किस तमन्ना के सहारे जी लिया मैंने।
१= अकेले

March 7, 2008

कुछ और मिजाज

कुछ तो होते हैं मोहब्बत में जुनूं के आसार,
और कुछ लोग भी दीवाना बना देते हैं।

मुशाफी

आंखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा,
कश्ती के मुसाफिर ने समंदर नही देखा।

पत्थर मुझे कहता है मेरा चाहने वाला,
मैं मोम हूँ उसने मुझे छूकर नहीं देखा।

बशीर बद्र

क्या कहें कैसे मरासम थे हमारे उसके,
वो जो इक शख्स है मुंह फेर के जाने वाला।

अहमद फराज


ऐ दोस्त हमने तर्क-ऐ-मोहब्बत के बावजूद,
महसूस की है तेरी जरूरत कभी-कभी।

नासिर काज़मी

आओ की कोई ख़ाब बुनें कल के वास्ते,
वरना ये रात आज के संगीन दौर की,
डस लेगी जान-ओ-दिल को कुछ ऐसे की जान-ओ-दिल ,
ता-उम्र फिर ना कोई हसीं खाब बुन सकें।

साहिर लुध्यानवी

मिट चले मेरी उम्मीदों की तरह हर्फ़ मगर,
आज तक तेरे खतों से तेरी खुश्बु ना गई।

अख्तर शीरानी

गर जिंदगी में मिल गए फिर इत्तफाक से,
पूछेंगे अपना हाल तेरी बेबसी से हम।

साहिर लुध्यानवी


तुम ने किया ना याद कभी भूल कर हमें,
हम ने तुम्हारी याद में सब कुछ भुला दिया।

बहादुर शाह ज़फर

पी लिया करते हैं जीने की तमन्ना में कभी,
डगमगाना भी ज़रुरी है संभलने के लिये।

वामिक जौनपुरी

March 6, 2008

अपनी कलम से

मजिंलें खोने लगीं अपने निशाँ ,
फासले बढ़ने लगे हैं दरम्याँ,

तुम पुकारोगे भी कैसे प्यार से,
बढ़ गई हैं ज़िंदगी में तलखियां।

18-2-1998

अब तुम पर विश्वास नहीं है,
जीने का अहसास नहीं है।

दुःख की लम्बी डगर मौत तक,
खुशियों का आभास नहीं है।

रात बिताऊं तन्हाई में,
और सुबह की आस नही है।

पीङ तो उठती है रह-रह के,
दर्द मगर कुछ ख़ास नही है।

14-2-1997

रिश्ते सब से तर्क हो गए,
मेरे मुझ से फर्क हो गए।

प्रेम बिछुङ गया अल्फाजों से,
तलवारों के अर्थ हो गए।

8-3-1997

तू सामने होता है तो लगता है, ज्यूं कोई तमन्ना ही नहीं,
तेरे जाते ही जाग जाते हैं मेरे अरमान हजारों।

4-1-1995

आती है तेरे खतों से खुशबु अब तलक भी,
ये और बात है अब हमको तेरी याद नहीं आती।

26-9-
1994


मेरी दीवानगी का असर देखिये,
आज उनके हैं चश्म-तर देखिये।


हम थक जायेंगे ये और बात है,
अभी मंजिलों का सफर देखिये।


14-3-1994

दोस्त जिंदगी को सजाऊं कैसे,
सख्त हालात हैं,हर बात बताऊं कैसे।

जा चुके थे तुम अरमान लिये दूर बहुत,
मैं सोचता ही रहा तुमको बुलाऊं कैसे।

चला मैं चार कदम और बिखर ही गया,
मेरा वजूद चूर-चूर उठाऊं कैसे।

पिया है मैंने जहर वक्त के होठों से ,
हाँ मैं जिंदा हूँ मगर होश में आऊँ कैसे।

17-2-1995

जिस राह हम चले थे वो जरकार है अब भी,
तुमको मेरी चाहत पे इख्तियार है अब भी।

हम थक चुके हैं चलके मंसूबों के जोर पर,
मंजिल जो चाहिए थी दरकार है अब भी।

तेरे तगाफुल ने जिस राह को मायूस किया,
तेरा,उसके हर इक मोड़ को इंतजार है अब भी।

तेरे जाने से इस दिल की बेचैनी ना गई,
इक धड़कन सी सीने में बेकरार है अब भी।

4-11-1995


रविंद्र सिंह मान

अभी - अभी

सब्र कहता है कि रफ्ता-रफ्ता मिट जाएगा दाग,
दिल कहता है की बुझने की ये चिंगारी नही।

यास चंगेजी

खुश भी हो लेते हैं तेरे बेकरार,
गम ही गम हो ,इश्क में ऐसा नही।

फिराक गोरखपुरी

इश्क में खाब का ख्याल किसे,
लगी आँख ,जब से आँख लगी।

मीर मोहम्मद हयात

ईद का दिन है गले आज तो मिल ले जालिम,
रस्म--दुनिया भी है, मौका भी है, दस्तूर भी है।


कह दो इन हसरतों को कहीं और जा बसें,
इतनी जगह कहाँ है दिल--दागदार में।

उमर--दराज मांग कर लाये थे चार दिन,
दो आरजू में कट गए, दो इंतजार में।

बहादुर शाह ज़फर

कलेजे में हजारों दाग ,दिल में हसरतें लाखों,
कमाई ले चला हूँ साथ अपने जिंदगी भर की।

आगा शायर

जब मैंने कहा की मरता हूँ, मुंह फेर के बोले,
सुनते तो हैं पर इश्क के मारे नहीं देखे।

सादिक अली हुसैन

मैं अकेला ही चला था जानिबे मंजिल मगर,
लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया।

मजरूह सुल्तानपुरी



हर एक बात पे कहते हो तुम की तू क्या है,
तुम ही कहो कि ये अंदाज़
--गुफ़्तगू क्या है।

जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा,
खुरेदते हो जो अब राख जुस्तजू क्या है।


रही ना ताक़त--गुफ़्तार और अगर हो भी,
तो किस उम्मीद से कहिये की आरज़ू क्या है।


हुआ है शाह का मुसाहिब,फिर है इतराता
वगरना शहर में गालिब की आबरु क्या है ।



रगों में दौड़ते फिरने के हम नही कायल,
जो आँख ही से ना टपका तो फिर लहू क्या है।

गालिब

मत पूछ क्या हाल है मेरा तेरे पीछे,
तू देख की क्या रंग है तेरा मेरे आगे।

ईमान मुझे रोके है तो खींचे है मुझे कुफ्र,
काबा मेरे पीछे है कलीसा मेरे आगे।

गो हाथ को जुम्बिश नहीं, आँखों में तो दम है,
रहने दो अभी सागर-ओ-मीना मेरे आगे।



गालिब

दो -चार लफ्ज़ कह के मैं खामोश हो गया,
वो मुस्करा के बोले,बहुत बोलते हो तुम।

बर्क़

जब तक जिये, बिखरते रहे,टूटते रहे,
हम साँस -साँस क़र्ज़ की सूरत अदा हुए।

निदा फाज़ली

ये और बात है की तआरुफ़ हो सके,
हम ज़िन्दगी के साथ बहुत दूर तक गए।

खुर्शीद अहमद

चलते-चलते

लिपटा मैं बोसा लेके तो बोले की देखिये,
ये दूसरी खता है वो पहला कसूर था।

अमीर मीनाई

वो भी मेरे पास से गुजरा इसी अंदाज से,
मैंने भी जाहिर किया,जैसे उसे देखा ना हो।

साबिर

दिल की मजबूरी भी क्या शै है की दर से अपने,
उसने सौ बार उठाया तो मैं सौ बार आया।

हसरत मोहानी

तुम ना आओगे तो मरने की हैं सौ तदवीरें,
मौत कुछ तुम तो नहीं हो कि बुला भी सकूं।

गालिब

गई तेरे बीमार के मुंह पे रौनक,
जान क्या जिस्म से निकली ,कोई अरमान निकला।

फानी

बात करनी तक तुम्हें आती ना थी,
ये हमारे सामने की बात है।

दाग़

है कुछ ऎसी ही बात जो चुप हूँ,
वरना क्या बात कर नहीं आती।

गालिब

जी बहुत चाहता है रोने को,
है कोई बात आज होने को।

मीर

तुम आये हो ना शब्--इंतज़ार गुज़री है
तलाश
में है सहर बार-बार गुज़री है।


वो बात सारे फ़साने में जिसका जिक्र ना था,
वो बात उनको बहुत नागवार गुजरी है।

गुल खिले हैं , उनसे मिले, मय पी है,
अजीब रंग में अबके बहार गुजरी है।

फैज़

बहाने और भी होते जो जिंदगी के लिये,
हम एक बार तेरी आरजू भी खो देते।

मजरूह सुल्तानपुरी

दिल वो काफ़िर है की मुझ को दिया चैन कभी,
बेवफा तू भी उसे ले के पशेमाँ होगा।

पशेमाँ= परेशान

कुर्बान अली

March 5, 2008

कुछ खास


दिल ले के मुफ्त कहते हैं कुछ काम का नहीं,
उल्टी शिकायतें हुईं , एहसान तो गया ।


दाग़

कत्ल और मुझ-से सख्त-जान का कत्ल,
तेग देखो, जरा कमर देखो।

अज़ीज़

एक रात आपने उम्मीद पे क्या रखा है,
आज तक हमने चिरागों को जला रखा है।

शा़ज

ऐ दोस्त हमने तर्क-ऐ-मोहब्बत के बावजूद,
महसूस की है
तेरी ज़रुरत कभी-कभी।

नासिर काजमी

ईरादे बांधता हूँ , सोचता हूँ, तोड़ देता हूँ,
कहीं ऐसा ना हो जाए, कहीं वैसा ना हो जाए।

हफीज जालंधरी

तुम मेरे लिये अब कोई इल्जाम ना ढूंढो ,
चाहा था इक तुम्हे यही इल्जाम बहुत है।

साहिर लुध्यानवी

इस 'नहीं' का कोई इलाज नहीं
रोज कहते हैं आप , 'आज' नहीं।

दाग़

इक उमर कट गई है तेरे इंतजार में,
ऐसे भी हैं कि कट सकी जिनसे एक रात

फिराक
गोरखपुरी

खैर गुजरी की न पहुँची तेरे दर तक वरना,
आह ने आग लगा दी है जहां ठहरी है।

हसरत मोहानी

आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक,
कौन जीता है तेरी जुल्फ के सर होने तक।

गालिब

वो आए बज्म में इतना तो 'मीर' ने देखा,
फिर उसके बाद चिरागों में रौशनी न रही।

मीर

आईना देख अपना सा मुंह ले के रह गए ,
साहब को दिल न देने पे कितना गरुर था।

गालिब

न जाने किस लिये उमीदवार बैठा हूँ,
इक ऐसी राह पे जो तेरी रहगुजर भी नहीं।

फैज़

जो छुपाने की थी ,वो बात बता दी मुझको,
जिंदगी तूने बहुत सख्त सजा दी मुझको।

सुलेमान अख्तर

जब आप जा ही रहे हैं तो तकल्लुफ़ कैसा,
ये जरुरी तो नहीं हाथ मिलाया जाए।

स अ रज्जाक

खामोशी

हश्र के दिन मेरी चुप का माजरा,
कुछ कुछ तुम से भी पूछा जाएगा।

हफीज जालंधरी

क्या क्यामत है शब--वस्ल खामोशी उसकी,
जिसकी तस्वीर को भी नाज है गोयाई* का।

गोयाई = बोलने का

रियाज़ खैराबादी

इफ्शां--राज*, शाने-वफ़ा, इमि्तहाने-सब्र**,
आज एक खामोशी ने बड़े हक़ अदा किये।

*=
रहस्य बताना,
**= धर्य का इम्तिहान

आरजू लखनवी

हश्र भी गुजरा , हश्र में भी ये सोच के हमने कुछ कहा,
गम की हिकायत* कौन सुनेगा,गम की हिकायत क्या कहिये

*=
कहानी

फा़नी

March 3, 2008

अफसाना

मेरे रोने का जिसमे किस्सा है ,
उम्र का बेहतरीन हिस्सा है।

अज्ञात

बात बढ़ कर फ़साना बनती है,
बात सुनता नहीं है जब कोई।

राही कुरैशी

खैर इन बातों में क्या रखा है,किस्सा ख़त्म कर,
मैं तुझे हमदर्द समझा था ये मेरी भूल थी।

रशीद अफरोज

यूँ ही जरा खामोश जो रहने लगे हैं हम,
लोगों ने कैसे कैसे फसाने बना लिये।

रजिया बेगम ख्वाजा

रात कम है ना छेड़ हिज्र की बात ,
ये बड़ी दास्ताँ है प्यारे।

हफीज जालंधरी

तुम ही ना सुन सको अगर किस्सा--गम सुनेगा कौन,
किसकी जबान खुलेगी फिर हम ना अगर सुना सके।

हफीज जालंधरी

कहतें हैं जवानी की कहानी जो कभी ,
पहले हम देर तलक बैठ के रो लेते हैं।

शाद अजीमाबादी

कहके ये फेर लिया मुंह मेरे अफसाने से,
फायदा रोज कही बात के दोहराने से।

फहीम गोरखपुरी

हमारी दास्ताँ शहरों की दीवारों पे चस्पां है,
हमें ढूंढेगी दुनिया कल पुराने इश्तहारों में.

अजीज बानो