लोग लेते हैं लुत्फ़ मेरे तमाशा होने का,
देख तेरी मोहब्बत ने क्या इनाम दिए हैं मुझको
***********************************
वह आवाज देते हैं,बुलाते हैं अब हमें,
नादाँ हैं कोई समझाये की कब्र से जवाब कौन दे।
***********************************
उनकी आंखो से छलकती है मय की मस्ती,
लोग समझते हैं की हम मैखाने से आए हैं।
**********************************
ख़बर दे गए जमाने को शरमा के तुम,
लोग समझ गए की हमारा तुमसे कुछ रिश्ता है।
**********************************
सब पूछते हैं मुझ से इस दर्द का सबब,
तू बता किस अंदाज से तेरा नाम बयां करुं।
**********************************
सब समझते हैं के मैं इश्क का मारा हूँ
हाँ , अनजान हैं,
के उन्होंने अभी मेरा महबूब नही देखा ।
*********************************
ये किस्से हैं ना रांझे के, न फरहाद की बातें,
ये बातें हैं हमारी बातें - तुम्हारी बातें।
********************************
यूँ ही कम है ज़िंदगी मोहब्बत के लिए ,
रूठ कर वक्त गवाने की ज़रुरत क्या है
********************************
बिना शुरू किए उसने अंजाम लिख दिया
उसने किताब पे अपनी , मेरा नाम लिख दिया
********************************
उठ के मत चले जाना
तुमसे रोशन कोना-कोना है,
ज़िंदगी और मौत का मतलब,
तुमको पाना और तुमको खोना है।
राजीव खन्ना
March 16, 2008
March 10, 2008
साहिर लुध्यानवी
तुमको ख़बर नहीं है मगर इक सादा लोह१ को,
बरबाद कर दिया तेरे दो दिन के प्यार ने।
१= सादा आदमी
***
लो आज हमने तोड़ दिया रिश्ता-ऐ-उम्मीद,
लो अब कभी गिला ना करेंगे किसी से हम।
***
किस दर्जा दिल-शिकन थे मोहब्बत के हादसे,
हम ज़िंदगी में फिर कोई अरमां ना कर सके।
***
सजा का हाल सुनाएं ज़जा1 की बात करें,
खुदा मिला हो जिन्हे वो खुदा की बात करें।
हर एक दौर का मजहब नया खुदा लाया,
करें तो हम भी मगर किस खुदा की बात करें।
वफ़ा-शियार2 कई हैं ,कोई हसीन भी तो हो,
चलो फिर आज उसी बेवफा की बात करें।
१= अच्छे कर्मों का फल
२=वफ़ा करने वाले
***
ये जमीन जिस कदर सजाई गयी,
जिन्दगी की तड़प बढाई गयी।
आईने से बिगड़ कर बैठ गए,
जिनकी सूरत जिन्हे दिखायी गई।
नस्ल दर नस्ल इंतजार रहा,
कसर1 टूटे ना बेनवाई२ गयी।
मौत पायी सलीब पर हमने ,
उमर बनबास में बितायी गई।
१= महल
२= गरीबी
***
लब१ पे पाबंदी तो है, अहसास पे पहरा तो है,
फिर भी अहल-ऐ-दिल2 को अहवाल-ऐ-बशर3 कहना तो है।
बुझ रहे हैं एक एक करके अकीदों4 के दीये,
इस अंधेरे का भी लेकिन सामना करना तो है।
१= बोलने
२= दिल वाले
३=आम आदमी का हाल
४=विश्वास
***
बहुत घुटन है,कोई सूरत-ऐ-बयां१ निकले,
अगर सदा२ ना उठे,कम से कम फुगां३ निकले।
फकीर-ऐ-शहर४ के तन पर लिबास बाकी है,
अमीर-ऐ-शहर५ के अरमां अभी कहाँ निकले।
हकीकतें हैं सलामत तो ख़ाब बहुतेरे,
उदास क्यों हो जो कुछ ख़ाब रायगां६ निकले।
उधर भी खाक उड़ी है ,उधर भी जख्म पड़े,
जिधर से होके बहारों के कारवां निकले।
सितम के दौर में हम अहल-ऐ-दिल७ ही काम आए,
जबाँ पे नाज था जिनको वो बेजबान निकले।
१= बताने का तरीका
२=बुलंद आवाज
३=दबी आवाज
४= ग़रीबों
५= अमीरों
६= बेकार
७= दिल वाले
***
मैं जिंदा हूँ ये मुश्तहर१ कीजिये,
मेरे कातिलों को ख़बर कीजिये।
जमीं सख्त है,आसमान दूर है,
बसर हो सके तो बसर कीजिये।
सितम के बहुत से हैं रद्द-ऐ-अमल२ ,
ज़रुरी नहीं चश्म-तर३ कीजिये।
१= बताना
२= प्रतिक्रिया
३= रोना
***
तुम ना जाने किस जहाँ में खो गए,
हम भरी दुनिया में तनहा हो गए।
***
अभी जिन्दां हूँ लेकिन सोचता रहता हूँ खिल्वत१ में,
की अब तक किस तमन्ना के सहारे जी लिया मैंने।
१= अकेले
बरबाद कर दिया तेरे दो दिन के प्यार ने।
१= सादा आदमी
***
लो आज हमने तोड़ दिया रिश्ता-ऐ-उम्मीद,
लो अब कभी गिला ना करेंगे किसी से हम।
***
किस दर्जा दिल-शिकन थे मोहब्बत के हादसे,
हम ज़िंदगी में फिर कोई अरमां ना कर सके।
***
सजा का हाल सुनाएं ज़जा1 की बात करें,
खुदा मिला हो जिन्हे वो खुदा की बात करें।
हर एक दौर का मजहब नया खुदा लाया,
करें तो हम भी मगर किस खुदा की बात करें।
वफ़ा-शियार2 कई हैं ,कोई हसीन भी तो हो,
चलो फिर आज उसी बेवफा की बात करें।
१= अच्छे कर्मों का फल
२=वफ़ा करने वाले
***
ये जमीन जिस कदर सजाई गयी,
जिन्दगी की तड़प बढाई गयी।
आईने से बिगड़ कर बैठ गए,
जिनकी सूरत जिन्हे दिखायी गई।
नस्ल दर नस्ल इंतजार रहा,
कसर1 टूटे ना बेनवाई२ गयी।
मौत पायी सलीब पर हमने ,
उमर बनबास में बितायी गई।
१= महल
२= गरीबी
***
लब१ पे पाबंदी तो है, अहसास पे पहरा तो है,
फिर भी अहल-ऐ-दिल2 को अहवाल-ऐ-बशर3 कहना तो है।
बुझ रहे हैं एक एक करके अकीदों4 के दीये,
इस अंधेरे का भी लेकिन सामना करना तो है।
१= बोलने
२= दिल वाले
३=आम आदमी का हाल
४=विश्वास
***
बहुत घुटन है,कोई सूरत-ऐ-बयां१ निकले,
अगर सदा२ ना उठे,कम से कम फुगां३ निकले।
फकीर-ऐ-शहर४ के तन पर लिबास बाकी है,
अमीर-ऐ-शहर५ के अरमां अभी कहाँ निकले।
हकीकतें हैं सलामत तो ख़ाब बहुतेरे,
उदास क्यों हो जो कुछ ख़ाब रायगां६ निकले।
उधर भी खाक उड़ी है ,उधर भी जख्म पड़े,
जिधर से होके बहारों के कारवां निकले।
सितम के दौर में हम अहल-ऐ-दिल७ ही काम आए,
जबाँ पे नाज था जिनको वो बेजबान निकले।
१= बताने का तरीका
२=बुलंद आवाज
३=दबी आवाज
४= ग़रीबों
५= अमीरों
६= बेकार
७= दिल वाले
***
मैं जिंदा हूँ ये मुश्तहर१ कीजिये,
मेरे कातिलों को ख़बर कीजिये।
जमीं सख्त है,आसमान दूर है,
बसर हो सके तो बसर कीजिये।
सितम के बहुत से हैं रद्द-ऐ-अमल२ ,
ज़रुरी नहीं चश्म-तर३ कीजिये।
१= बताना
२= प्रतिक्रिया
३= रोना
***
तुम ना जाने किस जहाँ में खो गए,
हम भरी दुनिया में तनहा हो गए।
***
अभी जिन्दां हूँ लेकिन सोचता रहता हूँ खिल्वत१ में,
की अब तक किस तमन्ना के सहारे जी लिया मैंने।
१= अकेले
March 7, 2008
कुछ और मिजाज
कुछ तो होते हैं मोहब्बत में जुनूं के आसार,
और कुछ लोग भी दीवाना बना देते हैं।
मुशाफी
आंखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा,
कश्ती के मुसाफिर ने समंदर नही देखा।
पत्थर मुझे कहता है मेरा चाहने वाला,
मैं मोम हूँ उसने मुझे छूकर नहीं देखा।
बशीर बद्र
क्या कहें कैसे मरासम थे हमारे उसके,
वो जो इक शख्स है मुंह फेर के जाने वाला।
अहमद फराज
ऐ दोस्त हमने तर्क-ऐ-मोहब्बत के बावजूद,
महसूस की है तेरी जरूरत कभी-कभी।
नासिर काज़मी
आओ की कोई ख़ाब बुनें कल के वास्ते,
वरना ये रात आज के संगीन दौर की,
डस लेगी जान-ओ-दिल को कुछ ऐसे की जान-ओ-दिल ,
ता-उम्र फिर ना कोई हसीं खाब बुन सकें।
साहिर लुध्यानवी
मिट चले मेरी उम्मीदों की तरह हर्फ़ मगर,
आज तक तेरे खतों से तेरी खुश्बु ना गई।
अख्तर शीरानी
गर जिंदगी में मिल गए फिर इत्तफाक से,
पूछेंगे अपना हाल तेरी बेबसी से हम।
साहिर लुध्यानवी
तुम ने किया ना याद कभी भूल कर हमें,
हम ने तुम्हारी याद में सब कुछ भुला दिया।
बहादुर शाह ज़फर
पी लिया करते हैं जीने की तमन्ना में कभी,
डगमगाना भी ज़रुरी है संभलने के लिये।
वामिक जौनपुरी
और कुछ लोग भी दीवाना बना देते हैं।
मुशाफी
आंखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा,
कश्ती के मुसाफिर ने समंदर नही देखा।
पत्थर मुझे कहता है मेरा चाहने वाला,
मैं मोम हूँ उसने मुझे छूकर नहीं देखा।
बशीर बद्र
क्या कहें कैसे मरासम थे हमारे उसके,
वो जो इक शख्स है मुंह फेर के जाने वाला।
अहमद फराज
ऐ दोस्त हमने तर्क-ऐ-मोहब्बत के बावजूद,
महसूस की है तेरी जरूरत कभी-कभी।
नासिर काज़मी
आओ की कोई ख़ाब बुनें कल के वास्ते,
वरना ये रात आज के संगीन दौर की,
डस लेगी जान-ओ-दिल को कुछ ऐसे की जान-ओ-दिल ,
ता-उम्र फिर ना कोई हसीं खाब बुन सकें।
साहिर लुध्यानवी
मिट चले मेरी उम्मीदों की तरह हर्फ़ मगर,
आज तक तेरे खतों से तेरी खुश्बु ना गई।
अख्तर शीरानी
गर जिंदगी में मिल गए फिर इत्तफाक से,
पूछेंगे अपना हाल तेरी बेबसी से हम।
साहिर लुध्यानवी
तुम ने किया ना याद कभी भूल कर हमें,
हम ने तुम्हारी याद में सब कुछ भुला दिया।
बहादुर शाह ज़फर
पी लिया करते हैं जीने की तमन्ना में कभी,
डगमगाना भी ज़रुरी है संभलने के लिये।
वामिक जौनपुरी
March 6, 2008
अपनी कलम से
अब तुम पर विश्वास नहीं है,
जीने का अहसास नहीं है।
दुःख की लम्बी डगर मौत तक,
खुशियों का आभास नहीं है।
रात बिताऊं तन्हाई में,
और सुबह की आस नही है।
पीङ तो उठती है रह-रह के,
दर्द मगर कुछ ख़ास नही है।
14-2-1997
रिश्ते सब से तर्क हो गए,
मेरे मुझ से फर्क हो गए।
प्रेम बिछुङ गया अल्फाजों से,
तलवारों के अर्थ हो गए।
8-3-1997
रविंद्र सिंह मान
अभी - अभी
सब्र कहता है कि रफ्ता-रफ्ता मिट जाएगा दाग,
दिल कहता है की बुझने की ये चिंगारी नही।
यास चंगेजी
खुश भी हो लेते हैं तेरे बेकरार,
गम ही गम हो ,इश्क में ऐसा नही।
फिराक गोरखपुरी
इश्क में खाब का ख्याल किसे,
न लगी आँख ,जब से आँख लगी।
मीर मोहम्मद हयात
ईद का दिन है गले आज तो मिल ले जालिम,
रस्म-ऐ-दुनिया भी है, मौका भी है, दस्तूर भी है।
कह दो इन हसरतों को कहीं और जा बसें,
इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दागदार में।
उमर-ऐ-दराज मांग कर लाये थे चार दिन,
दो आरजू में कट गए, दो इंतजार में।
बहादुर शाह ज़फर
कलेजे में हजारों दाग ,दिल में हसरतें लाखों,
कमाई ले चला हूँ साथ अपने जिंदगी भर की।
आगा शायर
जब मैंने कहा की मरता हूँ, मुंह फेर के बोले,
सुनते तो हैं पर इश्क के मारे नहीं देखे।
सादिक अली हुसैन
मैं अकेला ही चला था जानिबे मंजिल मगर,
लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया।
मजरूह सुल्तानपुरी
हर एक बात पे कहते हो तुम की तू क्या है,
तुम ही कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है।
जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा,
खुरेदते हो जो अब राख जुस्तजू क्या है।
रही ना ताक़त-ए-गुफ़्तार और अगर हो भी,
तो किस उम्मीद से कहिये की आरज़ू क्या है।
हुआ है शाह का मुसाहिब,फिर है इतराता
वगरना शहर में गालिब की आबरु क्या है ।
रगों में दौड़ते फिरने के हम नही कायल,
जो आँख ही से ना टपका तो फिर लहू क्या है।
गालिब
मत पूछ क्या हाल है मेरा तेरे पीछे,
तू देख की क्या रंग है तेरा मेरे आगे।
ईमान मुझे रोके है तो खींचे है मुझे कुफ्र,
काबा मेरे पीछे है कलीसा मेरे आगे।
गो हाथ को जुम्बिश नहीं, आँखों में तो दम है,
रहने दो अभी सागर-ओ-मीना मेरे आगे।
गालिब
दो -चार लफ्ज़ कह के मैं खामोश हो गया,
वो मुस्करा के बोले,बहुत बोलते हो तुम।
अ अ बर्क़
जब तक जिये, बिखरते रहे,टूटते रहे,
हम साँस -साँस क़र्ज़ की सूरत अदा हुए।
निदा फाज़ली
ये और बात है की तआरुफ़ न हो सके,
हम ज़िन्दगी के साथ बहुत दूर तक गए।
खुर्शीद अहमद
दिल कहता है की बुझने की ये चिंगारी नही।
यास चंगेजी
खुश भी हो लेते हैं तेरे बेकरार,
गम ही गम हो ,इश्क में ऐसा नही।
फिराक गोरखपुरी
इश्क में खाब का ख्याल किसे,
न लगी आँख ,जब से आँख लगी।
मीर मोहम्मद हयात
ईद का दिन है गले आज तो मिल ले जालिम,
रस्म-ऐ-दुनिया भी है, मौका भी है, दस्तूर भी है।
कह दो इन हसरतों को कहीं और जा बसें,
इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दागदार में।
उमर-ऐ-दराज मांग कर लाये थे चार दिन,
दो आरजू में कट गए, दो इंतजार में।
बहादुर शाह ज़फर
कलेजे में हजारों दाग ,दिल में हसरतें लाखों,
कमाई ले चला हूँ साथ अपने जिंदगी भर की।
आगा शायर
जब मैंने कहा की मरता हूँ, मुंह फेर के बोले,
सुनते तो हैं पर इश्क के मारे नहीं देखे।
सादिक अली हुसैन
मैं अकेला ही चला था जानिबे मंजिल मगर,
लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया।
मजरूह सुल्तानपुरी
हर एक बात पे कहते हो तुम की तू क्या है,
तुम ही कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है।
जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा,
खुरेदते हो जो अब राख जुस्तजू क्या है।
रही ना ताक़त-ए-गुफ़्तार और अगर हो भी,
तो किस उम्मीद से कहिये की आरज़ू क्या है।
हुआ है शाह का मुसाहिब,फिर है इतराता
वगरना शहर में गालिब की आबरु क्या है ।
रगों में दौड़ते फिरने के हम नही कायल,
जो आँख ही से ना टपका तो फिर लहू क्या है।
गालिब
मत पूछ क्या हाल है मेरा तेरे पीछे,
तू देख की क्या रंग है तेरा मेरे आगे।
ईमान मुझे रोके है तो खींचे है मुझे कुफ्र,
काबा मेरे पीछे है कलीसा मेरे आगे।
गो हाथ को जुम्बिश नहीं, आँखों में तो दम है,
रहने दो अभी सागर-ओ-मीना मेरे आगे।
गालिब
दो -चार लफ्ज़ कह के मैं खामोश हो गया,
वो मुस्करा के बोले,बहुत बोलते हो तुम।
अ अ बर्क़
जब तक जिये, बिखरते रहे,टूटते रहे,
हम साँस -साँस क़र्ज़ की सूरत अदा हुए।
निदा फाज़ली
ये और बात है की तआरुफ़ न हो सके,
हम ज़िन्दगी के साथ बहुत दूर तक गए।
खुर्शीद अहमद
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