December 30, 2010

दुःख फ़साना नहीं के तुझ से कहें

दुःख फ़साना नहीं के तुझ से कहें
दिल भी माना नहीं के तुझ से कहें

आज तक अपनी बेकली का सबब
खुद भी जाना नहीं के तुझ से कहें

एक तू हर्फ़ आशना था मगर
अब ज़माना नहीं के तुझ से कहें

बे -तरह दिल है और तुझ से
दोस्ताना नहीं के तुझ से कहें

खुदा दर्द - -दिल है बख्शीश - -दोस्त
आब - -दाना नहीं के तुझ से कहें

अहमद फ़राज़

दिल में किस दर्जा बेदिली है अभी

दिल में किस दर्जा बेदिली है अभी
हर खुशी जैसे अजनबी है अभी

फिर बढे हैं क़दम तेरी जानिब
तेरे गम में भी दिलकशी है अभी

[जानिब =towards/in the direction of]

मैं भी तुझ से बिछड़ के सर-गर्दां
तेरी आँखों में भी नमी है अभी

[सरगर्दां =distressed]

मैं ने माना बहुत अन्धेरा है
फिर भी थोड़ी सी रोशनी है अभी

December 26, 2010

इस का गिला नहीं

इस का गिला नहीं की दुआ बे-असर गई
इक आ़ह की थी वो भी कहीं जा के मर गई

हमनफ़स ना पूछ जवानी का माजरा
मौज--नसीम थी, इधर आई उधर गई

मौज--नसीम - wave of gentle breeze

दाम--गम-हयात में उलझा गई उम्मीद
हम ये समझ रहे थे कि एहसान कर गई

दाम--गम--हयात- Net of sorrows of life

इस ज़िन्दगी से हमको ना दुनिया मिली ना दीन
तकदीर का मुशाहिदा करते गुज़र गई

दीन - Religion
मुशाहिदा - Inspection

बस इतना होश था मुझे रोज़--विदा--दोस्त
वी़राना था नज़र में जहां तक नजर गई

हर मौज आब--सिंध हुई वक्फ--पेच--ताब
"महरूम" जब वतन में हमारी खबर हुई

आब--सिंध - Water of river sindh
वक्फ--पेच--ताब - Extremely angry


त्रिलोक चंद महरूम

किसे आवाज दूँ

किसको आती है मसीहाई किसे आवाज दूँ
बोल खूंखार तन्हाई किसे आवाज दूँ

चुप रहूँ तो हर नफ़स ड्सता है नागन की तरह
आह भरने में है रुसवाई किसे आवाज दूँ

उफ़ खामोशी की ये आहें दिल को भरमाती हुई
उफ़ ये सन्नाटे की शहनाई किसे आवाज दूँ


जोश मलीहाबादी



December 21, 2010

बारहा ऐसे भी अपने दिल को बहलाना पडा

बारहा ऐसे भी अपने दिल को बहलाना पड़ा
शाम -ऐ -तनहाई में यादों से लिपट जाना पड़ा

(बारहा : many times; शाम -ऐ -तन्हाई : a lonely evening)

हर दफा पहली शना-सईयाँ न याद आयीं उसे
हर दफा अपना तार्रुफ़ फिर से करवाना पड़ा

(शना -सईयाँ : acquaintances; तार्रुफ़ : introduction)

रेज़ा -रेज़ा हो गए हैं आज मेरे ख़्वाब फिर
आज एक पत्थर से फिर शीशे को टकराना पड़ा

(रेज़ा -रेज़ा : tatters)

ना -रसाईयों की थकन ने कर दिया हलकान फिर
दश्त से निकले तो वापिस दश्त में आना पड़ा

(ना -रसाई : out of reach; हलकान : counfused; दश्त : ruins)

फिर भी हम ने अक्ल को रहबर नहीं माना “जलील ”
दिल के गो हर फासिले पर हमें पछताना पड़ा

(रहबर : guide)

अहमद जलील