May 10, 2008

ग़ालिब

कभी नेकी भी उस के जी में गर आ जाये है मुझ से,

जफायें कर के अपनी याद शर्मा जाये है मुझ से।

खुदाया, जज़्बा-ऐ-दिल की मगर तासीर उल्टी है,

के जितना खींचता हूँ और खिंचता जाये है मुझ से।

वो बद-खू और मेरी दास्तान-ऐ-इश्क तूलानी,

इबारत मुख्तसर, क़ासिद भी घबरा जाये है मुझ से ।

उधर वो बद-गुमानी है, इधर ये नातुवानी है,

ना पूछा जाये है उस से, ना बोला जाये है मुझ से ।

संभलने दे मुझे ऐ ना-उम्मीदी क्या क़यामत है,

कि दामन-ऐ-ख़याल-ऐ-यार छूटा जाये है मुझ से ।

तकल्लुफ़ बर-तरफ़ नज्ज़ारगी मैं भी सही लेकिन,

वो देखा जाये कब ये ज़ुल्म देखा जाये है मुझ से ।

हुए हैं पाँव ही पहले नबर्द-ऐ-इश्क में ज़ख्मी,

ना भागा जाये है मुझ से ना ठहरा जाये है मुझ से ।

क़यामत है कि होवे मुद्दई का हम-सफर गालिब,

वो क़ाफिर जो खुदा को भी ना सौंपा जाये है मुझ से ।

ग़ालिब

चाक-ए-गिरेबां की तलाश


दिल के ऐवान में लिए गुल्शुदा शम्मों की कतार
नूर-ए-खुर्शीद से सहमे हुए, उकताए हुए

हुस्न-ए-महबूब के सय्याल तसव्वुर की तरह
अपनी तारीकी को भैंचे हुए, लिपटाए हुए


गायत-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ, सूरत-ए-आगाज़-ओ-म'आल
वही बेसूद तजस्सुस, वही बेकार सवाल


मुज़्महिल सा'अत-ए-इमरोज़ की बे-रंगी से
याद-ए-माज़ी से गमीन, दहशत-ए-फरशा से निदाल


तिशना-अफ्कार जो तस्कीन नहीं पाते हैं
सोखता अश्क जो आंखों में नहीं आते हैं
एक कड़ा दर्द जो गीत में ढलता ही नहीं
दिल के तारीक शिगाफों से निकलता ही नहीं


और एक उलझी हुई मौहूम सी दरमां की तलाश
दश्त-ओ-ज़िन्दां की हवस , चाक-ए-गिरेबां की तलाश

शकील बदायूनी

मेरे हमनफस, मेरे हमनवा, मुझे दोस्त बनके दगा ना दे,
मैं हूँ दर्द-ए-इश्क से जां-वलब, मुझे ज़िंदगी की दुआ ना दे।

मेरे दाग-ए-दिल से है रौशनी, उसी रौशनी से है ज़िंदगी,
मुझे डर है अये मेरे चारागर, ये चराग तू ही बुझा ना दे।

मुझे छोड़ दे मेरे हाल पर, तेरा क्या भरोसा है चारागर,
ये तेरी नवाज़िश-ए-मुख्तसर, मेरा दर्द और बढ़ा ना दे।

मेरा अज्म इतना बलंद है के पराए शोलों का डर नहीं,
मुझे खौफ आतिश-ए-गुल से है, ये कहीं चमन को जला ना दे।

वो उठे हैं लेके होम-ओ-सुबू, अरे ओ 'शकील' कहां है तू,
तेरा जाम लेने को बज़्म मे कोई और हाथ बढ़ा ना दे।

शकील बदायूनी

May 2, 2008

गालिब

जौर से बाज़ आये पर बाज़ आयें क्या
कहते हैं हम तुझ को मुह दिखलायें क्या।

रात दिन गर्दिश में हैं सात आसमां
हो रहेगा कुछ ना कुछ घबरायें क्या।

लाग हो तो उस को हम समझें लगाव
जब न हो कुछ भी तो धोखा खाएं क्या।

हो लिए क्यूं नामा-बर के साथ साथ,
या रब अपने ख़त को हम पहुँचायें क्या।

मौज-ऐ-खून सर से गुज़र ही क्यूं ना जाए
आस्तान-ऐ-यार से उठ जाएं क्या।

उम्र भर देखा किए मरने की राह
मर गए पर देखिये दिखलायें क्या।

पूछते हैं वो की गालिब कौन है
कोई बतलाये की हम बतलायें क्या।

ग़ालिब

तबीयत इन दिनों

तबीयत इन दिनों बेगाना-ऐ-गम होती जाती है ,
मेरे हिस्से कि गोया हर खुशी कम होती जाती है ।

वही है शाहिद-ओ-साकी, मगर दिल बुझता जाता है ,
वही है शम्मा लेकिन रोशनी कम होती जाती है।

क़यामत क्या ये ऐ हुस्न-ऐ-दो आलम होती जाती है,
के महफ़िल तो वही है, दिल-कशी कम होती जाती है ।

वही मैखाना-ओ-सहबा, वही सागर वही शीशा ,
मगर आवाज़-ऐ-नोशानोश मद्धम होती जाती है ।

वही है जिंदगी लेकिन "जिगर" ये हाल है अपना ,
के जैसे जिंदगी से जिंदगी कम होती जाती है ।

जि़गर मुरादाबादी