कैसे सुकून पाऊँ तुझे देखने के बाद,
अब क्या ग़ज़ल सुनाऊं तुझे देखने के बाद।
आवाज़ दे रही है मेरी जिंदगी मुझे,
जाऊं मैं या न जाऊं तुझे देखने के बाद।
काबे का एहतराम भी मेरी नज़र में है,
सर किस तरफ़ झुकाऊँ तुझे देखने के बाद ।
तेरी निगाह-ऐ-मस्त ने मखमूर कर दिया,
क्या मैकदे को जाऊं तुझे देखने के बाद ।
नज़रों में ताब-ऐ-दीद ही बाक़ी नही रही,
किस से नज़र मिलाऊँ तुझे देखने के बाद।
सईद शाहीदी
April 11, 2008
April 7, 2008
खुशकिस्मत लोग
वो लोग बहुत खुशकिस्मत थे
जो इश्क को काम समझते थे
या काम से आशिकी करते थे
हम जीते-जी मसरूफ रहे
कुछ इश्क किया कुछ काम किया
काम इश्क के आड़े आता रहा
और इश्क से काम उलझता रहा
फिर आख़िर तंग आ कर हमने
दोनों को अधूरा छोड़ दिया
फैज अहमद फैज
जो इश्क को काम समझते थे
या काम से आशिकी करते थे
हम जीते-जी मसरूफ रहे
कुछ इश्क किया कुछ काम किया
काम इश्क के आड़े आता रहा
और इश्क से काम उलझता रहा
फिर आख़िर तंग आ कर हमने
दोनों को अधूरा छोड़ दिया
फैज अहमद फैज
March 29, 2008
इस मौसम में
बस एक वक्त का खंजर मेरी तलाश में है,
जो रोज़ भेष बदल कर मेरी तलाश में है।
मैं एक कतरा हूं मेरा अलग वजूद तो है,
हुआ करे जो समंदर मेरी तलाश में है ।
मैं देवता की तरह कैद अपने मन्दिर में,
वो मेरे जिस्म के बाहर मेरी तलाश में है।
जिसके हाथ में एक फूल देके आया था,
उसी के हाथ का पत्थर मेरी तलाश में है।
कृष्ण बिहारी नूर
इक ग़ज़ल उस पे लिखूं दिल का तकाजा है बहुत,
इन दिनों ख़ुद से बिछड़ जाने का धड़का है बहुत ।
रात हो दिन हो गफलत हो की बेदारी हो,
उसको देखा तो नहीं है उसे सोचा है बहुत ।
तशनगी के भी मुकामात हैं क्या क्या यानी,
कभी दरिया नहीं काफी, कभी कतरा है बहुत ।
कोई आया है ज़रूर और यहाँ ठहरा भी है,
घर की दहलीज़ पा-ऐ-नूर उजाला है बहुत ।
कृष्ण बिहारी नूर
देखना है वो मुझ पर मेहरबान कितना है,
असलियत कहाँ तक है और गुमान कितना है।
क्या पनाह देती है और ये ज़मीन मुझ को,
और अभी मेरे सर पर आसमान कितना है ।
फिर उदास कर देगी सरसरी झलक उस की,
भूल कर ये दिल उस को शादमान कितना है।
जो रोज़ भेष बदल कर मेरी तलाश में है।
मैं एक कतरा हूं मेरा अलग वजूद तो है,
हुआ करे जो समंदर मेरी तलाश में है ।
मैं देवता की तरह कैद अपने मन्दिर में,
वो मेरे जिस्म के बाहर मेरी तलाश में है।
जिसके हाथ में एक फूल देके आया था,
उसी के हाथ का पत्थर मेरी तलाश में है।
कृष्ण बिहारी नूर
इक ग़ज़ल उस पे लिखूं दिल का तकाजा है बहुत,
इन दिनों ख़ुद से बिछड़ जाने का धड़का है बहुत ।
रात हो दिन हो गफलत हो की बेदारी हो,
उसको देखा तो नहीं है उसे सोचा है बहुत ।
तशनगी के भी मुकामात हैं क्या क्या यानी,
कभी दरिया नहीं काफी, कभी कतरा है बहुत ।
कोई आया है ज़रूर और यहाँ ठहरा भी है,
घर की दहलीज़ पा-ऐ-नूर उजाला है बहुत ।
कृष्ण बिहारी नूर
देखना है वो मुझ पर मेहरबान कितना है,
असलियत कहाँ तक है और गुमान कितना है।
क्या पनाह देती है और ये ज़मीन मुझ को,
और अभी मेरे सर पर आसमान कितना है ।
फिर उदास कर देगी सरसरी झलक उस की,
भूल कर ये दिल उस को शादमान कितना है।
कृष्ण बिहारी नूर
नज़र मिला न सके उस से उस निगाह के बाद,
वही है हाल हमारा जो हो गुनाह के बाद ।
मैं कैसे और किस सिम्त मोड़ता ख़ुद को ,
किसी की चाह न थी दिल में तेरी चाह के बाद ।
ज़मीर काँप तो जाता है आप कुछ भी कहें,
वो हो गुनाह से पहले के हो गुनाह के बाद ।
हवस ने तोड़ दी बरसों की साधना मेरी ,
गुनाह किया है ये जाना मगर गुनाह के बाद ।
गवाह चाह रहे थे वो बेगुनाही का
जुबां से कह न सका कुछ खुदा-गवाह के बाद ।
खतूत कर दिए वापिस मगर मेरी नींदें,
इन्हें भी छोड़ दो इक रहम की निगाह के बाद।
वही है हाल हमारा जो हो गुनाह के बाद ।
मैं कैसे और किस सिम्त मोड़ता ख़ुद को ,
किसी की चाह न थी दिल में तेरी चाह के बाद ।
ज़मीर काँप तो जाता है आप कुछ भी कहें,
वो हो गुनाह से पहले के हो गुनाह के बाद ।
हवस ने तोड़ दी बरसों की साधना मेरी ,
गुनाह किया है ये जाना मगर गुनाह के बाद ।
गवाह चाह रहे थे वो बेगुनाही का
जुबां से कह न सका कुछ खुदा-गवाह के बाद ।
खतूत कर दिए वापिस मगर मेरी नींदें,
इन्हें भी छोड़ दो इक रहम की निगाह के बाद।
March 25, 2008
पहली सी मोहब्बत न मांग
मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न माँग
मैं ने समझा था कि तू है तो दरख्शां है हयात
तेरा गम है तो गम-ए-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है
तू जो मिल जाये तो तकदीर निगूं हो जाये
यूँ ना था, मैं ने फकत चाहा था यूँ हो जाये
और भी दुःख हैं ज़माने मे मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब ना माँग
अनगिनत सदियों के तारीक़ बहीमाना तलिस्म
रेशम-ओ-अतलस-ओ-कम्ख्वाब में बुनवाये हुये
जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लिथड़े हुए, ख़ून में नहलाये हुए
जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से
पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मगर क्या कीजे
और भी दुःख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहते और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब ना माँग
'फैज़'
मैं ने समझा था कि तू है तो दरख्शां है हयात
तेरा गम है तो गम-ए-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है
तू जो मिल जाये तो तकदीर निगूं हो जाये
यूँ ना था, मैं ने फकत चाहा था यूँ हो जाये
और भी दुःख हैं ज़माने मे मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब ना माँग
अनगिनत सदियों के तारीक़ बहीमाना तलिस्म
रेशम-ओ-अतलस-ओ-कम्ख्वाब में बुनवाये हुये
जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लिथड़े हुए, ख़ून में नहलाये हुए
जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से
पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मगर क्या कीजे
और भी दुःख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहते और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब ना माँग
'फैज़'
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