December 7, 2010

सबसे खतरनाक - अवतार सिंह पाश


मेहनत की लूट सबसे खतरनाक नहीं होती,
पुलिस की मार सबसे खतरनाक नहीं होती
गद्दारी-लोभ की मुठ्ठी सबसे खतरनाक नहीं होती


बैठे-बिठाए पकड़े जाना - बुरा तो है
सहमी-सी चुप में जकड़े जाना - बुरा तो है
पर सबसे खतरनाक नहीं होता


सबसे खतरनाक होता है
मुर्दा शांति से भर जाना
ना होना तड़प का सब सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर जाना
सबसे खतरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना


सबसे खतरनाक वह आँख होती है
जो सब कुछ देखती हुई भी जमी बर्फ होती है
जिसकी नज़र दुनिया को मुहब्बत से चूमना भूल जाती है
जो चीज़ों से उठती अंधेपन की भाप पर ढुलक जाती है
जो रोजमर्रा के क्रम को पीती हुई
एक लक्ष्यहीन दुहराव के उलटफेर में खो जाती है


सबसे खतरनाक वह दिशा होती है
जिसमें आत्मा का सूरज डूब जाए
और उसकी मुर्दा धूप का टुकड़ा
आपके जिस्म के पूरब में चुभ जाए 





अवतार सिंह पाश

December 6, 2010

ज़िन्दगी ये तो नहीं तुझको संवारा ही ना हो


ज़िन्दगी ये तो नहीं तुझको संवारा ही
हो
कुछ ना कुछ तेरा एहसान उतारा ही
हो

कू-ए-कातिल की बड़ी धूम है, चल कर देख्नें
क्या खबर, कूचा-ए-दिलदार से प्यारा ही
हो

दिल को छू जाती है रात की आवाज कभी
चौंक उठता हूँ कहीं तूने पुकारा ही न हो

कभी पलकों पे चमकती है जो अश्कों की लकीर
सोचता हूँ तेरे आँचल का किनारा ही न हो

ज़िंदगी एक खलिश दे के न रह जा मुझको
दर्द वो दे जो किसी सूरत गवारा ही न हो

शर्म आती है के उस शहर में हम हैं के जहां
न मिले भीक तो लाखों का गुज़ारा ही न हो



जां निसार अख्तर


December 5, 2010

मैं वक़्त पे घर क्यूं नहीं जाता..



बेनाम सा ये दर्द ठहर क्यूं नहीं जाता
जो बीत गया है वो गुज़र क्यूं नहीं जाता

देखता हूं मैं उलझी हुई राहों का तमाशा
जाते है जिधर सब मैं उधर क्यूं नहीं जाता

वो एक ही चेहरा तो नहीं है जहां में
जो दूर है वो दिल से उतर क्यूं नहीं जाता

वो नाम ना जाने कब से, ना चेहरा ना बदन है
वो ख्वाब अगर है तो बिखर क्युं नहीं जाता

सब कुछ तो है क्या ढूंढती रहती है निगाहें
क्या बात है मैं वक़्त पे घर क्यूं नहीं जाता

निदा फाजली

हम के ठहरे अजनबी

हम के ठहरे अजनबी इतनी मुदारातों के बाद
फिर बनेंगे आशना कितनी मुलाकातों के बाद

मुदारातों - courtesies

कब नज़र में आएगी बे-दाग़ सब्जे की बहार
खून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बाद

सब्जे - garden

थे बहुत बे-दर्द लम्हे ख़त्म-ए-दर्द-ए-इश्क के
थीं बहुत बे-महर सुबहें महरबां रातों के बाद


दिल तो चाहा पर शिकस्त-ए-दिल ने मोहलत ही न दी
कुछ गिले शिकवे भी कर लेते, मुनाजातों के बाद

मुनाजातों - prayers

उनसे कहने जो गए थे फैज़ जां-सदका किये
अनकही ही रह गयी वो बात सब बातों के बाद

जां-सदका - On sake of life


फैज़ अहमद फैज़

अशआर मेरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं


अशआर मेरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं
कुछ शे़र फ़क़त उनको सुनाने के लिए हैं।

अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें
कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं।

आँखों में जो भर लोगे तो कांटो से चुभेंगे
ये ख़ाब तो पलकों पे सजाने के लिए हैं।

देखूं तेरे हाथों को तो लगता है तेरे हाथ
मंदिर में फ़कत दीप जलाने के लिए हैं।

सोचो तो बड़ी चीज़ है तहजीब बदन की
वरना तो बदन आग बुझाने के लिए हैं।

ये इल्म का सौदा ये रिसाले ये किताबें
इक शख्स की यादों को भुलाने के लिए हैं।


जां निसार अख्तर