December 5, 2010

अपने हमराह जो आते हो इधर से पहले


अपने हमराह जो आते हो इधर से पहले
दश्त पड़ता है मियाँ इश्क में घर से पहले।

चल दिए उठ के सू-ए-सहर-ए-वफ़ा कू-ए-हबीब
पूछ लेना था किसी खाक बसर से पहले।

इश्क पहले भी किया हिज्र का गम भी देखा
इतने तड़पे हैं ना घबराए न तरसे पहले।

जी बहलता ही नहीं अब कोई सा'अत कोई पल
रात ढलती ही नहीं चार पहर से पहले।

हम किसी दर पे ना ठिठके ना कहीं दस्तक दी
सैकड़ों दर थे मेरी जान तेरे दर से पहले।

चाँद से आँख मिली जी का उजाला जागा
हम को सौ बार हुई सुबह सहर से पहले।


इब्ने इंशा

December 4, 2010

सभी कुछ है तेरा दिया हुआ


सभी कुछ है तेरा दिया हुआ सभी राहतें सभी कल्फतें,
कभी सोहबतें कभी फुर्कतें कभी दूरियाँ कभी कुर्बतें।

ये सुखन जो हमने रकम किये ये हैं सब वर्क तेरी याद के
कोई लम्हा सुबह-ए-विसाल का, कई शाम-ए-हिज्र की कुर्बतें।

जो तुम्हारी मान लें नासीहा तो रहेगा दामन-ए-दिल में क्या
ना किसी उदू की अदावतें ना किसी सनम की मुरव्वतें।

मेरी जान आज का गम ना कर, के ना जाने कातिब-ए-वक़्त ने
किसी अपने कल में भी भूल कर कहीं लिख रखी हों मसर्रतें।


फैज़ अहमद फैज़



इतेफाक

बरसों के बाद देखा इक शख्स दिलरुबा सा
अभी जहन में नहीं है पर नाम था भला सा

अबरू
खिंचे खिंचे से आखें झुकी झुकी सी
बातें रुकी रुकी सी लहज़ा थका थका सा

अलफाज़ थे के जुगनु आवाज़ के सफ़र में

बन जाये जंगलों में जिस तरह रास्ता सा


ख़्वाबों में ख़्वाब उसके यादों में याद उसकी
नींदों में घुल गया हो जैसे के रतजगा सा

पहले भी लोग आये कितने ही ज़िंदगी में
वो हर तरह से लेकिन औरों से था जुदा सा

अगली मुहब्बत्तों ने वो नामुरादियाँ दीं
ताज़ा रफाक़तों से दिल था डरा डरा सा

कुछ ये के मुद्द्तों से हम भी नहीं थे रोये
कुछ ज़हर में बुझा था अहबाब का दिलासा

फिर यूं हुआ के सावन आंखो में आ बसे थे
फिर यूं हुआ के जैसे दिल भी था आबला सा

अब सच कहें तो यारों हम को खबर नहीं थी
बन जायेगा क़यामत इक वाक़या ज़रा सा

तेवर थे बेरूखी के अंदाज़ दोस्ती के
वो अजनबी था लेकिन लगता था आशना सा

हम दश्त थे के दरिया, हम ज़हर थे के अमृत
नाहक था ज़ोनुम हम को जब वो नहीं था प्यासा

हम ने भी उसको देखा कल शाम इत्तेफाक़न
अपना भी हाल है अब लोगों 'फराज़' का सा


अहमद फराज

ये ना थी हमारी किस्मत

ये ना थी हमारी किस्मत के विसाल-ए-यार होता ,
अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता.

तेरे वादे पे जिए हम तो ये जान झूठ जाना
कि खुशी से मर ना जाते अगर ऐतबार होता

तेरी नाज़ुकी से जाना कि बांधा था अहद बोदा
कभी तू ना तोड़ सकता अगर उस्तुवार होता

कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीर-ए-नीमकश को
यह ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता

ये कहाँ की दोस्ती है कि बने हैं दोस्त नासे
कोई चारासाज़ होता, कोई गमगुसार होता


रग-ए-संग से टपकता वो लहू कि फिर ना थमता
जिसे गम समझ रहे हो ये अगर शरार होता

गम अगरचे जां-गुसिल है पर कहाँ बचें कि दिल है
गम-ए-इश्क अगर ना होता गम-ए-रोज़गार होता

कहूं किस से मैं कि क्या है, शब्-ए-गम बुरी बला है
मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता

हुए मर के हम जो रुसवा, हुए क्यों ना गर्क-ए-दरिया
ना कभी जनाज़ा उठता, ना कहीं मज़ार होता

उसे कौन देख सकता कि यगना है वो यकता
अगर दुई की बू भी होती तो कहीं दो-चार होता

ये मसाइल-ए-तसव्वुफ, ये तेरा बयां ग़ालिब
तुझे हम वली समझते जो ना बादा-ख्वार होता



ग़ालिब

December 1, 2010

सोज-ए-गम देके मुझे

सोज-ए-गम देके मुझे उसने ये इरशाद किया,
जा तुझे कश-म-कश-ए-दहर से आज़ाद किया।

वो करें भी तो किन अलफ़ाज़ में तेरा शिकवा,
जिन को तेरी निगाह-ए-लुत्फ ने बर्बाद किया।

दिल की चोटों ने कभी चैन से रहने ना दिया,
जब चली सर्द हवा मैं ने तुझे याद किया।

ऐसे में मैं तेरे तज-तकल्लुफ़ पे निसार,
फिर तो फरमाए वफ़ा आप ने इरशाद किया।

इस का रोना नहीं क्यों तुमने किया दिल बर्बाद,
इस का गम है कि बहुत देर में बर्बाद किया।

इतना मासूम हूँ फितरत से, कली जब चटकी,
झुक के मैंने कहा, मुझ से कुछ इरशाद किया।

मेरी हर सांस है इस बात कि शाहिद-ए-मौत,
मैंने हर लुत्फ़ के मौके पे तुझे याद किया।

मुझको तो होश नहीं तुमको खबर हो शायद,
लोग कहते हैं कि तुमने मुझे बर्बाद किया।

वो तुझे याद करे जिसने भुलाया हो कभी,
हमने तुझ को ना भुलाया ना कभी याद किया।

कुछ नहीं इस के सिवा 'जोश' हरीफों का कलाम,
वस्ल ने शाद किया हिज्र ने नाशाद किया।


जोश मलीहाबादी