August 6, 2008

दर्द ही दर्द है बाकी

दर्द से मेरा अब रिश्ता क्या है,
दर्द ही दर्द बाकी
है अब दवा क्या है।

जेहन में गूंजते हैं हजारों नगमें,
जिसपे गाऊं वो साज़ बचा क्या है।

कहा बहुत कुछ हाल से अपने, मगर,
तुमने समझा ही नहीं माजरा क्या है।

इल्तजा, मिन्नतें, सजदा जिसके दर पे किया,
वो ईसा फकत ये बोला , तू चाहता क्या है।


मोहब्बत से यकीन मेरा उठ सा गया,
मोहब्बत कर के मगर कोई पाता क्या है।



डा राजीव


August 5, 2008

वक्त आता रहा , वक्त जाता रहा

वक्त के साथ कदम मिलाता रहा

ख़ुद अपनी ही हस्ती मिटाता रहा


रिश्ते चलते रहे चाल अपनी

हर बाज़ी पे मैं मात खाता रहा


अब गिरा हूँ जो उठ ना सकूंगा कभी

जिस्म कैसे अभी तक उठाता रहा


मेरा रहबर मेरा खुदा तू ही था

कैसे मुझपे तू इल्जाम उठाता रहा


अपनी औकात से बढ़ कर चाहा तुझे

इश्क मुझको मेरी औकात बताता रहा


मैं रहा मुन्तजिर, राह खाली रहे

वक्त आता रहा ,वक्त जाता रहा


मैं चुप था, मेरी खता थी कोई

तू ही इल्जाम सारे लगाता रहा


लाख चाह के मुझे भूलता ही नही

जाने कैसे तू हर पल भुलाता रहा


हर साँस पूछती थी तेरी खबर

हर धड़का तेरी याद दिलाता रहा


जान दे दी , अमानत उसी की ही थी

जिस्म बाकी रहा , साँस आता रहा


जिस कागज़ पे लिखा था नाम तेरा

कुरान समझा और माथे लगाता रहा


क्या पाया है मैंने खो के तुझे,
बाद तेरे ये हिसाब लगाता रहा।


डॉ राजीव

डा रविन्द्र सिंह मान

August 2, 2008

काश

एक मुस्लिम नाम वाले लड़के ने
मुझ पे बम्ब फेंका,
एक मुसलमान ने मुझे
अस्पताल पहुंचाया,
मैं पुरी कौम को आंतकवादी कहने से चूक गया।


डा रविंद्र सिंह मान

August 1, 2008

हालात की बात करें

आओ कोई ग़ज़ल लिखें, कुछ दिल की बात करें,
कुछ कहें जमाने की, कुछ इश्क की बात करें।

लम्हा--फुरकत का कुछ हिसाब देखें,
बीते दिनों के कुछ जज्बात की बात करें।

हालात जुदा हैं बहुत ,जज्बात की बातों से,
जज्ब करें सच को, हालात की बात करें।

खाबों को दरकिनार करें, सपनों से परे देखें,
सचाई के दलदल में ,औकात की बात करें।

जज्बात के वो किस्से, अंजाम नहीं पहुंचे,
किस उम्मीद से फ़िर, आगाज की बात करें।

ताबूत दफन करें ,अपनी नाकामियों के,
फ़िर से जलायें दिए, गुलाल की बात करें।

जब भी करें ,करें राज दिलों पे हम ,
क्यूँ सोचें दुनिया फतह की ,क्यूँ ताज की बात करें।

आओ मिलें गले और भुला दे रंजिशें सभी ,
ना हिंदू की करें बात, ना मुसलमां की बात करें।

दिल की ये मुश्किल है, ये कल को नहीं भुलाता,
अक्ल ये कहती है, कि आज की बात करें

अरमानों का
दरिया था , अश्कों में बहता था,
उम्मीद के सहरा में उसी बरसात की बात करें।

डा राजीव
डा रविन्द्र
सिंह मान

July 30, 2008

खो गया है आवाज लगाने वाला

अब खुशी है ना कोई गम सताने वाला,
मुझको मिला हर ज़ख्म जमाने वाला।

अपना हाल सुनाता था जो सबसे पहले,
बेहाल हो गया है, ख़ुद हाल सुनाने वाला।

खलिश उठती है तो , गुमान होता है,
दर्द
छुपा है अन्दर कोई सताने वाला।

मेरी किस्मत पे ना तरस खा दोस्त,
सबको मिलता नहीं साथ निभाने वाला।

अपने नाम का कोई और
देख
अपने जैसा, अपनी हस्ती मिटाने वाला।

साथी मिलता नहीं, और मिल जाए कभी,
मौका मिलता नहीं, हाल सुनाने वाला।

ख्याल उलझे हुए हैं, और मैं खामोश,
है कहीं कोई तूफ़ान आने वाला।

मेरे अन्दर भटकता है दरिया,
नहीं आता मुकाम आने वाला।

मैं भी गुम हूँ, मेरे अल्फाज भी गुम ,
खो गया ख़ुद आवाज लगाने वाला

तलाशता हूँ समेटने को ख़ुद को,
नहीं मिलता पता, ठिकाने वाला

डा राजीव
डा रविन्द्र सिंह मान