March 25, 2008
गालिब
आख़िर इस दर्द कि दवा क्या है।
हम हैं मुश्ताक और वो बेज़ार
या इलाही ये माजरा क्या है।
मैं भी मुँह मे ज़बान रखता हूँ
काश पूछो कि मुद्दा क्या है।
जब कि तुझ बिन नही कोई मौजूद
फिर ये हंगामा ए खुदा क्या है।
हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है।
जान तुम पर निसार करता हूँ
मैं नहीं जानता दुआ क्या है।
मैंने माना कि कुछ नहीं ग़ालिब
मुफ़्त हाथ आये तो बुरा क्या है ।
ग़ालिब
बहार आई
लौट आये हैं फिर अदम से
वो ख़्वाब सारे, शबाब सारे
जो तेरे होंटों पे मर मिटे थे
जो मिट के हर बार फिर जिए थे
निखर गएँ हैं गुलाब सारे
जो तेरी यादों से मुश्क्बू हैं
जो तेरे उश्शाक का लहू हैं
उबल पड़े हैं अज़ाब सारे
मलाल-ए-अहवाल-ए-दोस्तां भी
खुमार-ए-आगोश-ए-महवशां भी
गुबार-ए-खातिर के बाब सारे
तेरे हमारे
सवाल सारे, जवाब सारे
बहार आई तो खुल गए हैं
नए सिरे से हिसाब सारे
'फैज़'
March 17, 2008
मोमिन
रंज राहत-फज़ा नहीं होता।
बे-वफ़ा कहने की शिकायत है,
तो भी वादा-वफ़ा नहीं होता।
जिक्र-ऐ-अगयार से हुआ मालूम,
हर्फ़-ऐ-नासेह बुरा नहीं होता।
तुम हमारे किसी तरह ना हुए,
वरना दुनिया में क्या नहीं होता।
उस ने क्या जाने क्या किया ले कर,
दिल किसी काम का नहीं होता।
इम्तिहान कीजिये मेरा जब तक,
शौक़ ज़ोर-आज़मा नहीं होता।
एक दुश्मन की चर्ख है, ना रहे,
तुझ से ये ऐ दुआ नहीं होता।
नारसाई से दम रुके तो रुके,
मैं किसी से ख़फा नहीं होता।
तुम मेरे पास होते हो गोया,
जब कोई दूसरा नहीं होता।
हाल-ए-दिल यार को लिखूं क्यूँ-कर,
हाथ दिल से जुदा नहीं होता।
रहम कर, खस्म-ऐ-जान-ऐ-गैर ना हो,
सब का दिल एक सा नहीं होता।
दामन उसका जो है दराज़ तो हो,
दस्त-ए-आशिक रसा नहीं होता।
किसको है ज़ौक-ए-तल्ख़-कलामी लैक,
जंग बिन कुछ मज़ा नहीं होता।
चारा-ए-दिल सिवाय सब्र नहीं,
सो तुम्हारे सिवा नहीं होता।
क्यूँ सुने अर्ज़-ए-मुज़्तरिब ऐ मोमिन,
सनम आखिर खुदा नहीं होता।
फैज़ अहमद फैज़
बेशक सितम जनाब के सब दोस्ताना थे।
हाँ जो जफ़ा भी आप ने की,कायदे से की,
हाँ हम ही काराबंद-ए-उसूल-ए-वफ़ा ना थे।
आये तो यूँ की जैसे हमेशा थे मेहरबान,
भूले तो यूँ की गोया कभी आशना ना थे।
फैज़
हम पर तुम्हारी चाह का इल्ज़ाम ही तो है,
दुशनाम तो नहीं है ये इकराम ही तो है।
दिल मुद्दई के हर्फ़-ए-मलामत से शाद है,
ए जान-ए-जां, ये हर्फ़ तेरा नाम ही तो है।
दिल ना-उम्मीद तो नहीं, नाकाम ही तो है,
लम्बी है गम की शाम, मगर शाम ही तो है।
फैज़
गुलों मे रंग भरे बाद-ए-नौबहार चले
चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले।
कफ़स उदास है यारो सबा से कुछ तो कहो
कहीं तो बहर-ए-खुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले।
कभी तो सुबह तेरे कुन्ज-ए-लब से हो आगाज़
कभी तो शब सर-ए-काकुल से मुश्कबार चले।
बड़ा है दर्द का रिश्ता, ये दिल गरीब सही
तुम्हारे नाम पे आएंगे गमगुसार चले।
जो हम पे गुजरी सो गुजरी मगर शब-ए-हिजरां
हमारे अश्क तेरी आकबत संवार चले।
हुज़ूर-ए-यार हुई दफ्तर-ए-जुनून की तलब
गिरह मे लेके गरेबां के तार-तार चले।
मकाम कोई फैज़ राह मे जचा ही नही
जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले।
फैज़
आये कुछ अब्र कुछ शराब आये
उसके बाद आये जो अज़ाब आये।
उम्र के हर वर्क पे दिल को नज़र
तेरी मेहर-ओ-वफ़ा के बाब आये।
कर रहा था गम-ए-जहाँ का हिसाब
आज तुम याद बेहिसाब आये।
इस तरह अपनी खामोशी गूंजी
गोया हर सिम्त से जवाब आये।
'फैज़'
तुम न आये थे तो हर चीज़ वही थी के जो है
आसमाँ हद-ए-नज़र, राह-गुज़र राह-गुज़र, शीशा-ए-मय शीशा-ए-मय
और अब शीशा-ए-मय, राह-गुज़र, रंग-ए-फ़लक
रंग है दिल का मेरे "खून-ए-जिगर होने तक"
चम्पई रंग कभी, राहत-ए-दीदार का रंग
सुरमई रंग के है सा'अत-ए-बेज़ार का रंग
ज़र्द पत्तों का, खस-ओ-ख़ार का रंग
सुर्ख फूलों का, दहकते हुए गुलज़ार का रंग
ज़हर का रंग, लहू-रंग, शब-ए-तार का रंग
आसमाँ, राह-गुज़र, शीशा-ए-मय
कोई भीगा हुआ दामन, कोई दुखती हुई रग
कोई हर लहज़ा बदलता हुआ आइना है
अब जो आये हो तो ठहरो के कोई रंग, कोई रुत, कोई शय
एक जगह पर ठहरे
फिर से एक बार हर एक चीज़ वही हो जो है
आसमाँ हद-ए-नज़र, राह-गुज़र राह-गुज़र, शीशा-ए-मय शीशा-ए-मय
'फैज़'
आ के वाबस्ता हैं उस हुस्न की यादें तुझ से
जिस ने दिल को परी-खाना बना रखा था.
जिसकी उल्फत में भुला रखी थी दुनिया हम ने
दहर को दहर का अफ़साना बना रखा था.
आशनां हैं तेरे क़दमों से वो राहें जिन पर
उसकी मदहोश जवानी ने इनायत की है।
कारवाँ गुज़रे हैं जिन से उसी रानाई के
जिस की इन आंखों ने बे-सूद इबादत की है।
तुझ से खेली हैं वो महबूब हवाएं जिन में
उसके मलबूस की अफ्सुर्दा महक बाकी है.
तुझ पे भी बरसा है उस बाम से महताब का नूर
जिस में बीती हुई रातों की कसक बाकी है.
तू ने देखी है वो पेशानी, वो रुखसार, वो होंट
ज़िंदगी जिनके तसव्वुर में लुटा दी हम ने.
तुझ पे उठी हैं वो खोई हुई साहिर आँखें
तुझ को मालूम है क्यों उम्र गंवा दी हम ने.
हम पे मुस्कराते हैं एहसान गम-ए-उल्फत के
इतने एहसान की गिनवाऊं तो गिनवा न सकूं.
हम ने इस इश्क में क्या खोया है, क्या सीखा है
जुज़ तेरे और को समझाऊँ तो समझा न सकूँ.
आजिज़ी सीखी, गरीबों की हिमायत सीखी
यास-ओ-हिर्मान के, दुख-दर्द के मानी सीखे
ज़ेर-दस्तों के मसाइब को समझना सीखा
सर्द आहों के, रुख-ए-ज़र्द के मानी सीखे
जब कहीं बैठ के रोते हैं वो बे-कस जिनके
अश्क आंखों में बिलखते हुए सो जाते हैं
न-तावानों के निवालों पे झपटते हैं उकाब
बाज़ू तोले हुए, मंडराते हुए आते हैं
जब कभी बिकता है बाज़ार में मजदूर का गोश्त
शाहराहों पे गरीबों का लहू बहता है
आग सी सीने में रह रह के उबलती है, ना पूछ!
अपने दिल पर मुझे काबू ही नहीं रहता है !!
'फैज़'
कभी कभी याद में उभरते हैं नक्श-ऐ-माज़ी मिटे मिटे से
वो आज़माइश दिल-ओ-नज़र की, वो कुर्बतें सी, वो फासले से।
कभी कभी आरज़ू के सेहरा में आ के रुकते हैं क़ाफिले से
वो सारी बातें लगाओ की सी, वो सारे उनवान विसाल के से।
निगाह-ओ-दिल को करार कैसा, निशात-ओ-ग़म में कमी कहाँ की?
वो जब मिले हैं तो उन से हर बार की है उल्फत नए सिरे से ।
तुम ही कहो रिंद-ओ-मुह्तसिब में है आज शब कौन फर्क ऐसा
ये आ के बैठे हैं मयकदे में, वो उठ के आए हैं मयकदे से ।
'फैज़'
ग़ालिब
आह को चाहिये एक उम्र असर होने तक,
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक।
आशिकी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब,
दिल का क्या रंग करूँ ख़ून-ए-जिगर होने तक।
हमने माना की तगाफुल ना करोगे लेकिन,
ख़ाक हो जायेंगे हम तुमको खबर होने तक।
गम-ए-हस्ती का असद किस से हो जुज़ मर्ग ईलाज,
शमा हर रंग में जलती है सहर होने तक।
गालिब
ये ना थी हमारी किस्मत के विसाल-ए-यार होता,
अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता।
तेरे वादे पे जिए हम तो ये जान झूठ जाना,
कि खुशी से मर ना जाते अगर ऐतबार होता।
कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीर-ए-नीमकश को,
यह खलिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता।
कहूं किस से मैं की क्या है, शब्-ए-गम बुरी बला है,
मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता।
हुए मर के हम जो रुसवा, हुए क्यों ना गर्क-ए-दरिया,
ना कभी जनाज़ा उठता, ना कहीं मज़ार होता ।
गालिब
हज़ारों ख्वाहिशें ऎसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।
मोहब्बत मे नहीं है फर्क जीने और मरने का,
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पर दम निकले।
गालिब
दिल ही तो है ना संग-ए-खिश्त, दर्द से भर ना आये क्यों,
रोएंगे हम हज़ार बार, कोई हमें सताए क्यों।
दैर नहीं, हरम नहीं, दर नहीं, आस्तां नहीं,
बैठे हैं रहगुज़र पे हम, ग़ैर हमें उठाये क्यों।
क़ैद-ए-हयात-ओ-बंद-ए-गम असल मे दोनों एक हैं,
मौत से पहले आदमी गम से निजात पाए क्यों।
हाँ वो नहीं खुदापरस्त, जाओ वो बेवफा सही,
जिसको हो दीन-ओ-दिल अज़ीज़, उसकी गली मे जाये क्यों।
गालिब-ए-खस्ता के बग़ैर कौन से काम बंद हैं,
रोईये ज़ार-ज़ार क्या, कीजिए हाय-हाय क्यों।
गालिब