December 4, 2010

इतेफाक

बरसों के बाद देखा इक शख्स दिलरुबा सा
अभी जहन में नहीं है पर नाम था भला सा

अबरू
खिंचे खिंचे से आखें झुकी झुकी सी
बातें रुकी रुकी सी लहज़ा थका थका सा

अलफाज़ थे के जुगनु आवाज़ के सफ़र में

बन जाये जंगलों में जिस तरह रास्ता सा


ख़्वाबों में ख़्वाब उसके यादों में याद उसकी
नींदों में घुल गया हो जैसे के रतजगा सा

पहले भी लोग आये कितने ही ज़िंदगी में
वो हर तरह से लेकिन औरों से था जुदा सा

अगली मुहब्बत्तों ने वो नामुरादियाँ दीं
ताज़ा रफाक़तों से दिल था डरा डरा सा

कुछ ये के मुद्द्तों से हम भी नहीं थे रोये
कुछ ज़हर में बुझा था अहबाब का दिलासा

फिर यूं हुआ के सावन आंखो में आ बसे थे
फिर यूं हुआ के जैसे दिल भी था आबला सा

अब सच कहें तो यारों हम को खबर नहीं थी
बन जायेगा क़यामत इक वाक़या ज़रा सा

तेवर थे बेरूखी के अंदाज़ दोस्ती के
वो अजनबी था लेकिन लगता था आशना सा

हम दश्त थे के दरिया, हम ज़हर थे के अमृत
नाहक था ज़ोनुम हम को जब वो नहीं था प्यासा

हम ने भी उसको देखा कल शाम इत्तेफाक़न
अपना भी हाल है अब लोगों 'फराज़' का सा


अहमद फराज

ये ना थी हमारी किस्मत

ये ना थी हमारी किस्मत के विसाल-ए-यार होता ,
अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता.

तेरे वादे पे जिए हम तो ये जान झूठ जाना
कि खुशी से मर ना जाते अगर ऐतबार होता

तेरी नाज़ुकी से जाना कि बांधा था अहद बोदा
कभी तू ना तोड़ सकता अगर उस्तुवार होता

कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीर-ए-नीमकश को
यह ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता

ये कहाँ की दोस्ती है कि बने हैं दोस्त नासे
कोई चारासाज़ होता, कोई गमगुसार होता


रग-ए-संग से टपकता वो लहू कि फिर ना थमता
जिसे गम समझ रहे हो ये अगर शरार होता

गम अगरचे जां-गुसिल है पर कहाँ बचें कि दिल है
गम-ए-इश्क अगर ना होता गम-ए-रोज़गार होता

कहूं किस से मैं कि क्या है, शब्-ए-गम बुरी बला है
मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता

हुए मर के हम जो रुसवा, हुए क्यों ना गर्क-ए-दरिया
ना कभी जनाज़ा उठता, ना कहीं मज़ार होता

उसे कौन देख सकता कि यगना है वो यकता
अगर दुई की बू भी होती तो कहीं दो-चार होता

ये मसाइल-ए-तसव्वुफ, ये तेरा बयां ग़ालिब
तुझे हम वली समझते जो ना बादा-ख्वार होता



ग़ालिब

December 1, 2010

सोज-ए-गम देके मुझे

सोज-ए-गम देके मुझे उसने ये इरशाद किया,
जा तुझे कश-म-कश-ए-दहर से आज़ाद किया।

वो करें भी तो किन अलफ़ाज़ में तेरा शिकवा,
जिन को तेरी निगाह-ए-लुत्फ ने बर्बाद किया।

दिल की चोटों ने कभी चैन से रहने ना दिया,
जब चली सर्द हवा मैं ने तुझे याद किया।

ऐसे में मैं तेरे तज-तकल्लुफ़ पे निसार,
फिर तो फरमाए वफ़ा आप ने इरशाद किया।

इस का रोना नहीं क्यों तुमने किया दिल बर्बाद,
इस का गम है कि बहुत देर में बर्बाद किया।

इतना मासूम हूँ फितरत से, कली जब चटकी,
झुक के मैंने कहा, मुझ से कुछ इरशाद किया।

मेरी हर सांस है इस बात कि शाहिद-ए-मौत,
मैंने हर लुत्फ़ के मौके पे तुझे याद किया।

मुझको तो होश नहीं तुमको खबर हो शायद,
लोग कहते हैं कि तुमने मुझे बर्बाद किया।

वो तुझे याद करे जिसने भुलाया हो कभी,
हमने तुझ को ना भुलाया ना कभी याद किया।

कुछ नहीं इस के सिवा 'जोश' हरीफों का कलाम,
वस्ल ने शाद किया हिज्र ने नाशाद किया।


जोश मलीहाबादी

November 28, 2010

इस तरह खुश हूं

इस तरह खुश हूं किसी के वादा-ऐ-फर्दा पे मैं,
दर हकीक़त जैसे मुझ को ऐतबार आ ही गया ।

काम आख़िर जज्बा-ऐ-बेइख्तियार आ ही गया,
दिल कुछ इस सूरत से तड़पा उन को प्यार आ ही गया।

हाय ये हुस्न-ऐ-तसव्वुर का फरेब-ऐ-रंग-ओ-बू ,
मैं ने समझा जैसे वो जान-ऐ-बहार आ ही गया ।

जिगर मुरादाबादी

November 15, 2010

जुनून-ए-शौक अब भी कम नहीं है


जुनून-ए-शौक अब भी कम नहीं है
मगर वो आज भी बरहम नहीं है

बहुत मुश्किल है दुनिया का संवरना
तेरी जुल्फों के पेच-ओ-ख़म नहीं है

बहुत कुछ और भी है जहां में
ये दुनिया महज गम ही गम नहीं है

मेरी बरबादियों के हम-नशीनों
तुम्हें क्या खुद मुझे भी गम नहीं है

अभी बज़्म-ए-तरब से क्या उठूँ मैं
अभी तो आँख भी पुरनम नहीं है

'मजाज़' एक बादाकश तो है यक़ीनन
जो हम सुनते थे वो आलम नहीं है


मजाज़ लखनवी