July 2, 2011

होना उदास

नाराज हो सकता था मैं भी उनसे
जिनसे करता हूँ मुहब्बत
गर मुहब्बत ने सिखा न दिया होता
होना और रहना उदास.


ओरहान वेली

बहुमत जो उदास है

अल्पसंख्यक नहीं
मैं दुनिया के बहुमत से वास्ता रखता हूँ
बहुमत
जो उदास है
खामोश है
प्यासा है इतने चश्मो के बावजूद 




सुरजीत पातर

तलाश

मुझे वो शहर पता नहीं
किस दिन मिलेगा?
 वो शहर
जो दूर क्षितिज से पार बसता है
जहाँ गहरे नीले पानी की झील में
सपनों के हंस तैरते हैं
जहाँ ज़िंदगी
गुलाब की तरह महकती है
जहाँ दरिया
कभी न खत्म होने का
गीत गाता है...
मैं कई जन्मों से
उस शहर की तलाश में हूँ
मुझे वो शहर पता नहीं
किस दिन मिलेगा?
मैं कई जन्मों से
उस शहर की तलाश में हूँ

उसको खोजते-खोजते
ज़िंदगी उस सपने की तरह हो गई है
 जिसमें हम बस
चलते ही जाते हैं
पहुँचते कहीं भी नहीं।
ज़िंदगी उस सपने की तरह हो गई है
जिसमें हम बस
चलते ही जाते हैं
पहुँचते कहीं भी नहीं।




कमल

June 1, 2011

दो इश्क़

ताज़ा हैं अभी याद में, ऐ साकी-ए-गुलफाम
वो अक्स-ए-रुख-ए-यार से लहके हुए अय्याम
वो फूल सी खिलती हुई दीदार की सा'अत
वो दिल सा धड़कता हुआ उम्मीद का हंगाम 

उम्मीद कि लो जागा ग़म-ए-दिल का नसीबा
लो शौक़ की तरसी हुई शब् हो गई आखिर
लो डूब गए दर्द के बे-ख्वाब सितारे
अब चमकेगा बे-सब्र निगाहों का मुक़द्दर
इस बाम से निकलेगा तेरे हुस्न का खुर्शीद
उस कुंज से फूटेगी किरन रंग-ए-हिना की
इस दर से बहेगा तेरी रफ़्तार का सीमाब
उस राह पे फूलेगी शफ़क़ तेरी क़बा की  

फिर देखें हैं वो हिज्र के तपते हुए दिन भी
जब फ़िक्र-ए-दिल-ओ-जान में फुगाँ भूल गई है
हर शब् वो सिया बोझ कि दिल बैठ गया है
हर सुब्ह की लौ तीर सी सीने में लगी है
तन्हाई में क्या क्या न तुझे याद किया है
क्या क्या न दिल-ए-ज़ार ने ढूंडी हैं पनाहें
आँखों से लगाया है कभी दस्त-ए-सबा को
डाली हैं कभी गरदन-ए-महताब में बाहें 

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 चाहा हैं इसी रंग में लैला-ए-वतन को
तड़पा है इसी तौर से दिल उसकी लगन में
ढूंडी है यूं ही शौक़ ने आसा'इश-ए-मंज़िल
रुखसार के ख़म में, कभी काकुल की शिकन में 

उस जान-ए-जहां को भी यूंही क़ल्ब-ओ-नज़र ने
हंस हंस के सदा दी, कभी रो रो के पुकारा
पूरे किये सब हर्फ़-ए-तमन्ना के तकाज़े
हर दर्द को उज्याला, हर एक ग़म को संवारा

वापस नहीं फेरा कोई फरमान जुनूं का
तनहा नहीं लौटी कभी आवाज़ जरस की
खैरियत-ए-जान, राहत-ए-तन, सेहत-ए-दामन
सब भूल गयीं मसलहतें अहल-ए-हवस की  

इस राह में जो सब पे गुज़रती है वो गुज़री
तनहा पस-ए-ज़िन्दां, कभी रुसवा सर-ए-बाज़ार
गरजे हैं बहुत शेख सर-ए-गोशा-ए-मिन्बर
कड़के हैं बहुत अहल-ए-हुक्म बर सर-ए-दरबार

छोड़ा नहीं ग़ैरों ने कोई नावक-ए-दुशनाम
छूटी नहीं अपनों से कोई तर्ज़-ए-मलामत
इस इश्क़ न उस इश्क़ पे नादिम है मगर दिल
हर दाग़ है इस दिल में ब-जुज़ दाग़-ए-नदामत
 
    फैज़ 

From " Dasht -e- Sabaa" 

January 23, 2011

अब वही हर्फ़-ए-जनून

अब वही हर्फ़--जुनून सब की जुबां ठहरी है
जो भी चल निकली है वो बात कहाँ ठहरी है

आज तक शैख़ के इकराम में जो शय थी हराम
अब वही दुश्मन--दीन राहत--जान ठहरी है

है खबर गर्म की फिरता है गुरेजां नासेह
गुफ्तगू आज सर--कू--बुतां ठहरी है

है वही आरिज--लैला वही शीरियन का दहन
निगाह--शौक घड़ी भर को यहाँ ठहरी है

वस्ल की शब थी तो किस दर्जा सुबक गुजरी थी
हिज्र की शब है तो क्या सख्त-गराँ ठहरी है

बिखरी एक बार तो हाथ आई कहाँ मौज--शमीम
दिल से निकली है तो कब लब पे फुगां ठहरी है

दस्त--सय्याद भी आज़िज है कफ--गुलचीं भी
बू--गुल ठहरी ना बुल-बुल की जबां ठहरी है

आते आते यूँ ही दम भर को रुकी होगी बहार
जाते जाते यूँ ही पल भर को खिजां ठहरी है

हम ने जो तर्ज़--फुगां की है कफस में इजाद
'फैज़' गुलशन में वो तर्ज़--बयान ठहरी है


फैज़ अहमद फैज़