कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है
के ज़िंदगी तिरी जुल्फों के नर्म सायों में
गुजरने पाती तो शादाब हो भी सकती थी
ये तीरगी जो मेरी जीस्त का मुकद्दर है
तेरी नज़र कि शुआयों में खो भी सकती थी
अजब ना था कि मैं बेगाना-ऐ-आलम रह कर
तिरी जमाल कि रानाइयों में खो रहता
तिरा गुदाज़ बदन तेरी नीमबाज़ आंखें
इन्हीं हसीन फसानों में महव हो रहता
पुकारती मुझे जब तल्खियां ज़माने की
तिरे लबों से हलावत के घूँट पी लेता
हयात चीखती फिरती बरहना सर और मैं
घनेरी ज़ुल्फ के साए में छुप के जी लेता
मगर ये हो ना सका और अब ये आलम है
के तू नहीं, तिरा गम ,तेरी जुस्तजू भी नहीं
गुज़र रही है कुछ इस तरह ज़िंदगी जैसे
इसे किसी के सहारे कि आरजू भी नहीं
ज़माने भर के दुखों को लगा चुका हूँ गले
गुज़र रहा हूँ कुछ अनजानी रह गुजारों से
मुहीब साए मेरी सम्त बढ़ते आते हैं
हयात-ओ-मौत के पुरहौल खारज़ारों से
ना कोई जादा, ना मंजिल, ना रोशनी का सुराग
भटक रही है खलायों में जिंदगी मेरी
इन्हीं खलायों में रह जाऊंगा कभी खोकर
मैं जानता हूँ मेरी हमनफस मगर यूंही
कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है
साहिर लुध्यानवी
May 15, 2008
May 14, 2008
साहिर लुध्यानवी
हवस नसीब नज़र को कहीं करार नहीं
मैं मुन्तजिर हूं, मगर तेरा इंतज़ार नहीं
हमीं से रंग-ऐ-गुलिस्तां, हमीं से रंग-ऐ-बहार
हमीं को नज्म-ऐ-गुलिस्तां पे इख्तियार नहीं
अभी न छेड़ मुह्ब्बत के गीत ऐ मुतरिब
अभी हयात का माहौल खुशगवार नहीं
तुम्हारे अहद-ऐ-वफ़ा को मैं अहद क्या समझूं
मुजे ख़ुद अपनी मुहब्बत का एतबार नहीं
न जाने कितने गिले इसमें मुज्तरिब हैं नदीम
वो एक दिल जो किसी का गिला-गुजार नहीं
गुरेज़ का नहीं कायल हयात से, लेकिन
जो सच कहूं तो मुझे मौत नागवार नहीं
ये किस मकाम पे पहुंचा दिया ज़माने ने
के अब हयात पे तेरा भी इख्तियार नहीं
साहिर लुध्यानवी
May 13, 2008
हिम्मत-ऐ- इल्तजा नहीं बाकी
हिम्मत-ऐ- इल्तजा नहीं बाकी
ज़ब्त का हौसला नहीं बाकी
इक तेरी दीद छिन गई मुझसे
वरना दुनिया में क्या नहीं बाकी
अपनी मशक-ऐ-सितम से हाथ ना खींच
मैं नहीं या वफ़ा नहीं बाकी
तेरी चश्म-ऐ-आलमनवाज़ कि खैर
दिल में कोई गिला नहीं बाकी
हो चुका खत्म अहद-ऐ-हिज़र-ओ-विसाल
ज़िंदगी में मज़ा नहीं बाकी
फैज़ अहमद फैज़
ज़ब्त का हौसला नहीं बाकी
इक तेरी दीद छिन गई मुझसे
वरना दुनिया में क्या नहीं बाकी
अपनी मशक-ऐ-सितम से हाथ ना खींच
मैं नहीं या वफ़ा नहीं बाकी
तेरी चश्म-ऐ-आलमनवाज़ कि खैर
दिल में कोई गिला नहीं बाकी
हो चुका खत्म अहद-ऐ-हिज़र-ओ-विसाल
ज़िंदगी में मज़ा नहीं बाकी
फैज़ अहमद फैज़
May 12, 2008
खुदा वो वक्त ना लाये
खुदा वो वक्त ना लाये की सोगवार हो तू
सुकून कि नींद तुझे भी हराम हो जाए
तेरी मसर्रत-ऐ-पैहम तमाम हो जाए
तेरी हयात तुझे तल्ख़ जाम हो जाए
ग़मों से आइना -ऐ-दिल गुदाज हो तेरा
हुजूम-ऐ-यास से बेताब होके रह जाए
वाफूर-ऐ-दर्द से सीमाब होके रह जाए
तेरा शबाब फ़क़त खाब होके रह जाए
गुरूर-ऐ-हुसन सरापा नियाज़ हो तेरा
तबील रातों में तू भी करार को तरसे
तेरी निगाह किसी गम गुसार को तरसे
खिजां रसीदा तमन्ना बहार को तरसे
कोई जबीं ना तेरे संग-ऐ-आस्तां पे झुके
कि जींस-ऐ- ईज-ओ-अकीदत से तुझ को शाद करे
फरेब-ऐ-वादा-ऐ-फर्दा पे एतमाद करे
खुदा वो वक्त ना लाये कि तुझको याद आए
वो दिल कि तेरे लिए बेकरार अब भी है
वो आँख जिसको तेरा इंतज़ार अब भी है
फैज़ अहमद फैज़
सुकून कि नींद तुझे भी हराम हो जाए
तेरी मसर्रत-ऐ-पैहम तमाम हो जाए
तेरी हयात तुझे तल्ख़ जाम हो जाए
ग़मों से आइना -ऐ-दिल गुदाज हो तेरा
हुजूम-ऐ-यास से बेताब होके रह जाए
वाफूर-ऐ-दर्द से सीमाब होके रह जाए
तेरा शबाब फ़क़त खाब होके रह जाए
गुरूर-ऐ-हुसन सरापा नियाज़ हो तेरा
तबील रातों में तू भी करार को तरसे
तेरी निगाह किसी गम गुसार को तरसे
खिजां रसीदा तमन्ना बहार को तरसे
कोई जबीं ना तेरे संग-ऐ-आस्तां पे झुके
कि जींस-ऐ- ईज-ओ-अकीदत से तुझ को शाद करे
फरेब-ऐ-वादा-ऐ-फर्दा पे एतमाद करे
खुदा वो वक्त ना लाये कि तुझको याद आए
वो दिल कि तेरे लिए बेकरार अब भी है
वो आँख जिसको तेरा इंतज़ार अब भी है
फैज़ अहमद फैज़
May 11, 2008
मोहब्बत में हार के
दोनों जहाँ तेरी मोहब्बत में हार के
वो जा रहा है कोई शब-ऐ-गम गुजार के
वीरान है मैकदा खुम-ओ-सागर उदास है
तुम क्या गए के रूठ गए दिन बहार के
इक फुरसत-ऐ-गुनाह मिली, वो भी चार दिन
देखे हैं हम ने हौसले परवर-दिगार के
दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया
तुझ से भी दिल फरेब हैं गम रोज़गार के
भूले से मुस्करा तो दिए थे वो आज 'फैज़'
मत पूछ वल-वले दिल-ऐ-ना-कर्दाकार के
फैज अहमद फैज़
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