November 15, 2010

चेहरा मेरा था निगाहें उसकी


चेहरा मेरा था निगाहें उसकी ,
खामुशी में भी वो बातें उसकी।

मेरे चेहरे पे ग़ज़ल लिखती गयीं ,
शेर कहती हुई आँखे उसकी।

शोख लम्हों का पता देने लगीं ,
तेज़ होती हुई सांसें उसकी।

ऐसे मौसम भी गुज़ारे हमने,
सुबहें जब अपनी थीं शामें उसकी।

ध्यान में उसके ये आलम था कभी,
आँख महताब की यादें उसकी।

फैसला मौज-ए-हवा ने लिखा,
आंधियां मेरी बहारें उसकी।

नींद इस सोच से टूटती अक्सर,
किस तरह कटती हैं रातें उसकी।

दूर रह कर भी सदा रहती हैं,
मुझको थामे हुए बाहें उसकी।



परवीन शा़किर

2 comments:

ana said...

सुंदर अभिव्यक्ति

महेन्द्र मिश्र said...

bahut badhiya abhivyakti ...badhiya sher ...abhaar